Wednesday, 17 July 2013

शब्द की उत्पत्ति


         
शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, शब्द कैसे बना, शब्द बनाने में किसका महान योगदान रहा, यह जानने का विषय है।एक महान व्याकरण के निर्माता महर्षि पाणिनी हुए। उन्होंने अपनी प्रज्ञा के बल पर शब्द का निर्माण किया। महर्षि पाणिनी भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। वे शिव की उपासना करते थे। भगवान शिव की उन पर विशेष अनुकम्पा थी।एक बार वे भगवान शिव की साधना में लीन थे, तभी भगवान शिव ने अपना डमरु बजाया। उन्होंने १४ बार अपना डमरु बजाया, और हर बार उनके डमरु से शब्द निकले। महर्षि पाणिनी ने उन शब्दों को सुना, और उन शब्दों को अपने दिमाग में लिपिबद्ध किया।ये शब्द है-
१.अ इ उ ण् २.ऋ लृ क् ३. ए ओ ड़् ४. ऐ औ च् ५.ह य व र ट् ६.लञ् ७.ञ म ड़् ण न म् ८. झ भ ञ् ९. घ ड़ ध ष् १०. ज ब ग ढ़ द श् ११. ख फ छ ठ थ च ट त व् १२.क प य् १३. श ष स र् १४. ह ल्
                   यही चौदह सूत्र माहेश्वर सूत्र कहलाए। क्योंकि ये महर्षि पाणिनी को महेश्वर की कृपा से प्राप्त हुए थे। इनको प्रत्याहार सूत्र भी कहते है। क्योंकि इनके द्वारा बड़ी सरलता से सूक्ष्म रीति से अक्षरों का बोध हो जाता है। पाणिनी ने इन सूत्रो के आधार पर स्वरों एवं व्यंजनों को पहचान कर उन्हें अलग- अलग किया। ऊपर के वर्ण हल् है, वे इत् कहलाते है। जैसे- ण् क् आदि ।
कोई वर्ण लेकर उसके साथ यदि इत् जोड़े तो उस अक्षर के और उस इत् के बीच के सभी वर्णो का बोध हो जाता है। उन्होंने स्वरों और व्यंजनों की सहायता से अपने द्वारा निर्मित सूत्र बनाकर शब्दों का निर्माण किया। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है, उन्होंने सबसे प्रथम संस्कृत व्याकरण की रचना की, फिर व्याकरण की सहायता से संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ।महर्षि पाणिनी व्याकरण के सबसे प्रथम प्रणेता है।वे शब्दों के निर्माता है। संसार में सर्वप्रथम संस्कृत भाषा का उद् भव हुआ ,संस्कृत के द्वारा सभी भाषाओं का निर्माण हुआ।हिन्दी, उर्दू, मराठी, बांग्ला, जर्मनी, लैटिन, तथा अन्य सभी भाषाएँ संस्कृत से ही निकली है। आज संसार में जितनी भी भाषाएँ बोली या सुनी जाती है। बड़ी सरलता से हम उस भाषा का प्रयोग करते है। इन सबमें पाणिनी का कितना योगदान रहा है, इस बात का हम अनुमान भी नही लगा सकते।
कितना कठिन और कितना अद् भूत कितना विस्मयकारी काम उन्होंने सबके लिए किया है।
डमरु बजाने पर उन शब्दों को सुनना , डमरु से निकलने पर उन शब्दों को याद रखना , फिर उसमे से स्वर और व्यंजन को पहचानना।फिर व्यंजन में स्वरों को जोड़कर शब्द का निर्माण करना। कितना आश्चर्य में डालने वाला काम है।कितने महान थे महर्षि पाणिनी, और कितना महान था उनका संस्कृत व्याकरण ।उदाहरण के लिए सिर्फ एक शब्द का निर्माण देखिए-
                   प्राजापत्य -   प्रजापतेः अपत्यम् इति प्राजापत्यम् -    लौकिक विग्रह
                   अलौकिक विग्रह-  प्रजापति +ड़्स
                   कृत् तद्धित समासाश्च सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा
                   सुपोधातु प्रातिपदिकयोः सूत्र से सुप् का लोप = प्रजापति
                   दित्य दित्या दित्य सूत्र से व्य प्रत्यय
                   प्रजापति+ व्य    चुरु सूत्र से व् का लोप
                   प्रजापति+य   यस्येति च सूत्र से इ वर्ग का लोप
                   प्राजापत्+य= प्राजापत्य         प्रातिपदिकात्  सु
                   सषशुयोरु से   स् को र
                   खरवसाजयोः  विसर्जनीयम् र् को विसर्ग होकर  =  प्राजापत्यः
          इस प्रकार सामासिक शब्द बना    प्राजापत्यः
यह सिर्फ एक उदाहरण है, एक शब्द में अनेक सूत्रो का प्रयोग हुआ ,एसे असंख्य अनगिनत सूत्रों का प्रयोग हुआ ।संस्कृत व्याकरण का प्रादुर्भाव हुआ। दिव्य, अलौकिक, अद्भुत व्याकरण प्रणेता महर्षि पाणिनी को मेरा शत्-शत् नमन ।

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