मनुष्य की विचारधारा का लिपिबद्ध स्वरुप ही साहित्य
है। साहित्य का सम्बन्ध मुख्यत; कला से है, न कि वाक् शक्ति से। अतएव साहित्य भावनाओं को लिपिबद्ध स्वरुप देता है।साहित्य बाह्य
या दृश्य सत्य को प्रकट नही करता, वरन विचारों को।
साहित्य मनुष्य के विश्वव्यापी भावनाओं का प्रतीक
है। साहित्य का मूल भाषा है। आपकी कलम में
एक शक्ति होती है। क्योंकि भाषा ने यदि अस्तव्यस्त मानव जाति को एक सामुहिक रुप प्रदान
किया, तो साहित्य ने उस समुह को संस्कृत बनाने में सहयोग दिया है। जब मनुष्य के ह्रदय
में भावनाएँ उद्भूद हुई, तब स्वभावत; उन्हें प्रकट करने की इच्छा हुई। पहले हस्तादि
के इंगितों द्वारा यह इच्छा पुरी हुई,बाद को वाक् शक्ति के प्रभाव से विचारो का आदान-
प्रदान हुआ। उन विचारों को विस्मृति गंगा से बचाने के लिए लिपिबद्ध करना पड़ा। जिससे
साहित्य की सृष्टि हुई।साहित्य निर्माण तक मानव जाति काफी ज्ञान प्राप्त कर चुकी थी।
भाषा का निर्माण अज्ञानावस्था में हुआ, साहित्य का ज्ञानावस्था में।भा षाऔर साहित्य
का सम्बन्ध एक दूसरे पर आश्रित है। भाषा मनुष्य के पाशविक आवश्यकताओं की पूर्ति करती
है। साहित्य उसके संस्कार जन्य मानसिक प्रवृतियों की पिपासा शान्त करती है। भाषा असंयम
है, साहित्य संयम । मनुष्य के मनुष्यत्व की भी परख साहित्य के ही द्वारा हो सकती है।
हमारे उदगार जो हमारे ह्रदय में
अन्तर्निहित है, चाहे वह दुखपूर्ण हो या सुखपूर्ण
भावनाओं का प्रतीक है।
लिखने
की, गाने की, बोलने की जो प्रतीति है, हमारे ह्रदय में निहित बलवती इच्छा को अचानक
प्रगट करती है। हमारी जब कुछ कहने की या गाने की इच्छा होती है, तब शब्द अपने आप मुँह
से निकल पड़ते है, हम उसे रोक नही पाते।
‘पौधे
में जब पुष्प खिलता है, पुष्प खिलने से पूर्व उसमें कली आती है। तब वह आपसे पुछ्ती
है कि मै आऊँ’ ठीक उसी प्रकार मेरे ह्रदय रुपी पुष्प में मेरे मन में अचानक यह विचार
आया कि मैं कुछ लिखूँ,और मैं लिखने बैठ गई।
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