"करुण ही एक रस है अन्य रस तो उसी के विकार है।”
राम और सीता के जीवन की विभिन्न घटनाओं में प्रेम, वीरता, अद्भुत,भय आदि रसों का दर्शन होता है पर कथा का प्रधान रस तो करूण ही हैं । कवि ने प्रेम के कल्याणमय दाम्पत्यस्वरूप के पराकाष्ठा का प्रत्यक्ष दर्शन करवाया है।
भवभूति ने प्रेम तत्व को ऐसा गौरव दिया है फिर भी प्रेम को आत्मा का अंश ही माना है।महान कवि सत्य को अतिशयोक्ति से विकृत नहीं होने देते। प्रेम आत्मा की कला - आत्मा का अंश मात्र है, पर साथ ही यह अंश अमृत है।
आत्मा के अमृत अंश रूप प्रेम ही सर्वोपरि है। राम का चरित्र एक आदर्श व्यक्ति के रूप में व्यक्त किया है। जनसाधारण के लिए राम देव है, परन्तु कवि ने अपने महावीर को मनुष्य ही बनाए रखने का उपक्रम किया है। पर वाल्मीकि की रामायण के प्रति उनमें जो श्रद्धा थी उसके कारण एक स्थान पर तो वे कला के संयम को छोड़कर राम को परमेश्वर के रूप में ही देखते हैं।पर यह सत्य है कि भवभूति राम के चरित्र में उदात्त मानवीय भावना तथा नाटक के नायक के उपर्युक्त आदर्श ला सकने में सफल हुए हैं,राम में अनेक चारित्रिक गुण है। गुरुजनों में भक्ति तथा आदर वास्तविक विनय उनके आदेशों के पालन करने की तत्परता और यह विश्वास कि गुरुजनों के आदेश तो प्रच्छन्न आशीर्वाद ही हैं।
कैकयी के आचरण के विषय में कोई चर्चा नहीं करना उनकी संस्कारित को प्रदर्शित करता है।
कुलगौरव तथा मर्यादा में दृढ़ विश्वास -वे अपने पिता को आदर्श नृप के रूप में करते हैं तथा अपने आचरण में भी उस आदर्श को चरितार्थ करने को उद्यत रहते हैं।
उनकी वीरता तथा पराक्रमों के विषय में दो संदेह ही नहीं है साथ ही उनमें महत्ता का सच्चा गुण विनय है वह अपने प्रिय भाई के मुख से भी अपने वीरता की प्रशंसा सुनना नहीं चाहते उनकी पत्नी सीता जो कदाचित सबसे अधिक उनको समझती थी उनके इस विनय महात्म्य पर मुक्त हो जाती है यह उक्ति अनुरक्ता पत्नी की ही नहीं पर एक सूक्ष्मदर्शी की है राम राज्य को जो उच्चतम प्रकार की राज्य व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठा मिली है उसका आधार है राजधर्म के पालन में संपूर्ण आत्म त्याग तथा यह मान्यता कि लोकाराधन के लिए कोई भी त्याग बड़ा नहीं है राम स्वयं राज धर्म के इस आदर्श को मानते हैं
स्नेहम् दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि
आराधनाय लोकस्य मुण्चतो नास्ति में व्यथा।
राम की व्यथा यही है कि वह इस उच्च आदर्श को पूर्ण रूप से निभाते हैं लोकाराधन के लिए वह रावण का वध करते हैं तथा पत्नी का भी त्याग करते हैं वह अपने अन्वगउढघनव्यथ: शोक कों अपनी छाती में ही छुपाई रखते हैं यद्यपि वह पुटपाक के सामान अंदर ही अंदर उनको दग्ध करता रहता है जब सहवास के पूर्व परिचित स्थान में अकेले पहुंचते हैं तब पूरोत्पीड से युक्त तटाव के समान ही उनका शौक बांध तोड़कर बह निकलता है पर वहां भी वे लोगों से अपनी इस व्यवस्था के लिए क्षमा याचना करते हैं राम का यह राजा रूप तो गौरवमय है ही पर उनकी मानव सुलभ भावनाओं का आवेग भी उत्कट है। पत्नी के प्रति उनका जो प्रेम है वह अनुपम तथा अद्वितीय ही हैं,वह तो प्रतीक हैं उस सर्वोच्च आनंद का जो किसी विरले ही भाग्यशाली मनुष्य को प्राप्त होता है। इसलिए उसका त्याग करने के लिए बाध्य होने पर अपनी अत्यधिक भर्त्सना करते हैं अपने को - अपूर्वकर्मचाण्डाल कहते हैं। उनकी इस आत्म-भर्त्सना की उक्ति में तो जनक या वासन्ति की आलोचना भी नहीं कर सकती राम की मानवता तो उभरती है इस भर्त्सना में जब वह मनुष्य के रूप में अपने राजा रूप के काम से घृणा करते हैं वह उस वृक्ष के समान है जिसका वर्णन भवभूति ने किया है वृक्ष के समान ही वे सबको छाया देते हुए रक्षा करते हैं तथा कीड़े मकोड़े उनकी जड़ काटने का प्रयत्न करते हैं पर वह धीर गंभीर रहकर धर्म की रक्षा करते रहते हैं उनका गंभीर गौरव उनके भाव रूप की अगाधता को आवृत्त किए हुए रहता है उनका प्रेम अनुपम है और इसीलिए उनके शोक की किसी से तुलना नहीं हो सकती कुश ने ठीक ही कहा था कि
""विना सीता देव्या किमिव ही न दुखं रघुपति:
प्रिय नाशे कृत्शनं किल जगदरण्यं ही भवति।
राम चाहे राजा के रूप में वज्र से कठोर हो पर मानव रूप में तो कुसुम से भी कोमल है इसी वर्णन में ही उनके संघर्षमय महान
व्यक्तित्व की सूचना मिलती है यही उनके असाधारण व्यक्तित्व का मूल्यांकन भी है।
आज के समय में श्री नरेन्द्र मोदी जी पर ऐसा लगता है मानो श्री राम जी ने उनके मस्तक पर अपने दोनों मुक्त हस्तों से आशीर्वाद लुटाया है। मोदी जी का जीवन एक आदर्श राजा के रूप में परिलक्षित होता है। मोदीजी का विशिष्ट जीवन दर्शन,उनका जीवन रहस्य एक निर्णायक तत्वरुप में स्थित रहता है। मोदीजी की विशिष्ट सृष्टि उनकी विशिष्ट दृष्टि का परिणाम है। मोदीजी का आदर्श वादी स्वभाव जिसके प्रभाव से वे अपने लोकरंजन के धर्म को अत्यधिक महत्व देते है
मोदीजी ने एक ऐसे भारत की कल्पना अपने मन में बसा ली है। ऐसा लगता है मानो त्रेतायुग का रामराज्य लौट आया है चारों ओर सम्पूर्ण भारत राममय हो गया है।देश का बच्चा बच्चा आज राम में पुरी तरह से लीन हो गया है। देश की व्यवस्था उनकी राजनीतिक व्यवस्था से ऊपर उठ कर धर्म मय हो गई है बड़े बड़े भव्य अलौकिक मंदिरों का निर्माण करवाना और फिर उनकी व्यवस्था को संभालना कोई असाधारण व्यक्ति ही कर सकता है
हमको रामराज्य कैसा था यह तो नहीं पता, हमने अपने मन में सिर्फ रामराज्य की कल्पना मात्र की है। लेकिन मोदीजी का रामराज्य आज हम देख रहे हैं उसका अनुभव कर रहे है। चारों ओर सम्पूर्ण भारत में अपार खुशियां छाई हुई है लोग अपनी मस्ती में नाच रहे है झुम रहे हैं बच्चे वृद्ध सभी प्रातः काल राम नाम की प्रभात फेरी निकाल रहे है राम नाम में मस्त हो कर झुमते
गाते जा रहे हैं सब कुछ भुलाकर सिर्फ एक मात्र राम का नाम याद है ऐसा अद्भुत अलौकिक क्षण मैंने तो अपनी जिंदगी में पहली बार देखा है ।
सारे मंदिर सज कर तैयार है गली गली में हर घर राम जी की पताका लहरा रही है। और इसका सारा श्रेय मोदी जी का है। मोदी जी स्वयं भी एक विलक्षण प्रतिभा वाले प्राणी है उनकी ऐसी धर्म की पराकाष्ठा को मेरा शत् शत् नमन।
धर्म के प्रति उनकी पराकाष्ठा को मेरा शत् शत् नमन।