वाणी की महिमा
महापुरुषों की वाणी सारे ब्रह्माण्ड
में हमेशा गुंजायमान रहती है। वे जो भी कहते है, जो भी उच्चारण करते है, अथवा उनके
मुँह से जो भी शब्द निकलते है, वे हमेशा विद्यमान रहते, कभी नही मरते, इस संसार में
अमर हो जाते है। इसी प्रकार एक महापुरुष हुए –पंडितराज जगन्नाथ । संस्कृत के प्रकांड
विद्वान । अलंकारशास्त्र के महान ज्ञाता। उन्होनें संस्कृत में कई बड़े- बड़े ग्रन्थों
की रचना की। रसगंगाधर उनका प्रसिद्ध ग्रंथ है। पण्डितराज काशी में रहते थे। वे अपना
अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात जयपुर आये ,और एक पाठशाला क्र्र स्थापना की। एक दिन दिल्ली
से आए हुए किसी काजी को मुसलमानों के मजहबी ग्रंथों को शीघ्र पढ़कर विवाद में परास्त
कर दिया। जब वह काजी जयपुर से लौटकर दिल्ली आए, तब उन्होंने बादशाह के आगे पन्डितराज
की बड़ी प्रसंशा की। बादशाह उनकी प्रसंशा सुनकर
खुश हुए, और उन्हॅ दिल्ली बुला लिया।काफी समय तक दिल्ली रहने के बाद वे काशी
लौट आए, काशी में रहकर वे अपना अन्तिम समय बिताना चाहते थे। यह एक सत्य घटना है,एक
दिन पण्डितराज अपनी यवन पत्नि के साथ काशी के गंगा तट पर सो रहे थे, और उनकी शुक्ल
शिखा खटिया के नीचे लटक रही थी ।मुख वस्त्र से ढँका था। इसी समय संयोग से अप्पयदीक्षित
इसी घाट पर स्नान करने के लिए आए, और एक वृद्ध का एसा निकृष्ट आचरण देखकर कह उठे-‘किं
निश्शकं शेषे,शेषे वयसि त्वमागते मृत्यौ’ इस शेष आयु में विषय भोग से मुख मोड़ो,
ईश्वर का चिन्तन करो,मृत्यु निकट ही आने वाली है ।
इस
पद्यांश को सुनकर जब पण्डितराज ने अपना मुख बाहर निकालकर उनकी ओर देखा, तब उन्हें पहचान
कर वे बड़ी शीघ्रता से कह उठे- ‘अथवा सुखं
शयीथा, निकटे जाह्नवी भवत;’ अथवा आप सुख पूर्वक सोओ, पा ही गंगाजी विद्यमान है। यह सुनकर उनको बहुत गुस्सा आया, और उन्होनें गंगा
तट पर सबसे ऊपर की सीढ़ी पर बैठकर तत्काल रचित स्वकीय पद्यों से गंगा की स्तुति करने
लगे ।(जो गंगालहरी के नाम से प्रसिद्ध हुई’)आपकी स्तुति से प्रसन्न होकर प्रति पद्य पर एक-एक सीढ़ी ऊपर चढ़ती
हुई बावनवें पद्य पर आपके निकट पहुँच गई,और यवन पत्नि सहित आपको अपने साथ बहा ले गई
। इस प्रकार आप गंगाजी के पावन जल में समाहित हो गए। वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने बड़े
आश्च्रर्य के साथ इस दृश्य को देखा ,और बड़ी श्रद्धा के साथ उन्हें प्रणाम किया। आज
भी उनकी वाणी उनके पदों मे अमर है।
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