Tuesday, 16 July 2013

नारी स्वतंत्रता एक अभिशाप


नारी स्वतंत्रता –युगों-युगों से नारी पुरुष के अधीन रही है, और आज भी वह अपना जीवन पुरुषों के अधीन रहकर ही व्यतीत करती है। उसका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व नही है, पुरुष नारी की इसी विवशता का फायदा उठाकर उसे शोषित करता रहता है। पुरुष यह बिलकुल नही चाहता कि नारी स्वतंत्र रहे। वह हमारे साथ स्वतंत्रता का व्यवहार करे।
                             लेकिन अब सब कुछ बदल रहा है।धीरे- धीरे नारी में चेतना जाग्रत हो रही है। वह अपने अस्तित्व को पहचानने लगी है। समाज के हर क्षैत्र में महिलाओं ने अपना स्थान बनाने की भरसक कौशीश की,और एक हद तक अपनी कौशीश में सफल भी रही है।
फिर भी यह एक जटिल सत्य है कि यदि १०% महिला समाज में समानता स्थापित कर सकी है तो २०% महिला समाज में पुरुषों द्वारा प्रताड़ित हो रही है।दहेज समस्या के अन्तर्गत आज भी किसी महिला की दर्दनाक कहानी कहती हुई नजर आती है। हर वर्ग में चाहे वह उच्च वर्ग हो, मध्यम हो, या निम्न वर्ग हो।वह एक बेबस गाय की तरह नजर आयेगी।
                   उच्च वर्ग में अकेली नीर्जिव खिलौनों से बातें करती हुई नशे में धुत आधी रात तक अपने पति को अपने पास पायेगी, तथा होठों को खोलने पर,शिकायत के दो लफ्ज यदि होठों से निकले तो ,बदले में बजाय सहानुभूति के मार खाएगी।निम्न वर्ग की हालात तो और भी बदतर है। दिनभर मेहनत करके अपनी मेहनत की कमाई भी शराब पर उड़ाकर पति के लात- घुसे खाकर चुपचाप अपना जीवन व्यतीत करती रहती है।इन सबसे हटकर मध्यम वर्ग की महिला यदि कुछ कहना चाहती है तो उनकी सारी हसरते सारी प्रतिभाएँ सारी इच्छाएँअपने सीने में दबकर रह जाती है।
                             क्या यही हिं देश में नारी की स्थिति ।जहाँ वह पति के चरणों की धुल को अपनी माँग का सिन्दुर बनाकर किसी बेजान गाय की तरह चुपचाप उनकी सेवा करती रहती है। पुरुष चाँद तक पहुँच चूका है, लेकिन कितने आश्चर्य एवं दुख की बात है कि आज तक स्त्री का हाथ पुरुष के गिरेबान तक नही पहुँच सका। आखिर क्यों-    क्यों    -स्त्री आखिर किस दिन यह समझेगी कि उसके अधिकार पुरुष से कम नही है।
                                      आखिर कब तक वह पुरुष की नादिरशाही आज्ञाओं के आगे चुपचाप अपना सर झुकाती रहेगी। नारी को चाहिए कि वह समानता का जीवन व्यतीत करने के लिए ,समाज मे अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए हर संभव कौशीश करे।
                                      यदि नारी का मन पुष्प से भी ज्यादा कोमल है, तो समय और परिस्थिति उसे पत्थर से भी ज्यादा कठोर बना सकती है।
                                      जिस दिन घड़ी की सुईयाँ विपरित दिशा में चलने लगेगी, उस दिन यह देश अपनी महानता खो बेठेंगा।इसका इतिहास दागदार हो जायगा, फिर यह देश सीता और सावित्री का देश न होकर शुर्पणखाँ का देश हो जायगा।
                   अनेकों युगों से शोषित नारी का जीवन एक अभिशाप ही है।
                                                

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