Tuesday, 30 July 2013

श्री शिव पण्चाक्षर स्तोत्र


नागेन्द्रहाराय  त्रिलोचनाय ,भस्माड़गगाय  महेश्वराय
नित्यस्य शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै ‘न’ काराय नमः शिवाय (१)
मन्दाकिनीसलिल चन्दन वर्चिताय, नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मन्दारपुष्प बहुपुष्पसुपूजिताय,तस्मै ‘म’ काराय नमः शिवाय। (२)
शिवाय गौरीवदनाब्ज वृन्द सूर्याय दक्षाध्वानाशकाय,
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,तस्मै ‘शि’ काराय नमः शिवाय।(३)
वसिष्ठकुम्भोद्भव गौतमार्य, मुनीन्द्रदेवार्चित्शेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै ‘वा’ काराय नमः शिवाय।(४)
यक्षस्वरुपाय जटाधराय, पिनाकहन्ताय सनातनाय,
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,तस्मै ‘य’ काराय नमः शिवाय।(५)
पण्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव संनिधौ,
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।

Saturday, 27 July 2013

शिव स्तुति


जय शिव शंकर ,जय गंगाधर, जय करुणाकर, करतार हरे।
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशी सुखसार हरे।
जय शशि शेखर, जय डमरुधर जय जय प्रेमागार हरे।
जय त्रिपुरारि, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे।
                   निर्गुण जय- जय सगुण अनामय निराकार साकार हरे।
                   पारवतीपति हर हर शम्भो , पाही पाही दातार हरे।
जय सोमेश्वर, जय जागेश्वर, वैद्यनाथ केदार हरे।
मल्लिकार्जुन सोमनाथ जय महाँकाल ओंकार हरे।
त्रयंम्बकेश्वर जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे।
काशीपति श्री विश्वनाथ जय, मंगलमय अघहार हरे।
                   नीलकण्ठ जय भूतनाथ जय , मृत्युण्जय अविकार हरे।
                   पारवति पति हर हर शम्भो । पाहि-पाहि दातार हरे।
जय महेश जय जय भवेश जय आदिदेव महादेव विभो ।
किस मुख से है गुणातीत , प्रभु तव अपार गुण वर्णन हो।
जय भवकारक , तारत, हारक, पातकदारक, शिव शम्भो।
दीन दुखाहर, सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाकर की जय हो।
                   पार लगा दो भवसागर से, बनकर करुणा धार हरे।
                   पारवति पति हर-्हर शम्भो ,पाहि-पाहि दातार हरे।
जय मनभावन , जय अतिपावन, शोक नशावन शिव शम्भो,
विपद विदारन, अधम उधारन, सत्य सनातन शिव शम्भो।
सहज वचन हर , जलज नयन्वर, धवल वरन धन शिव शम्भो,
मदन कदन कर, पापहरन हर, चरन मनन धन शिव शम्भो।
                             विवसन ,विश्वरुप, प्रलयंकर जग के मूलाधार हरे।
                             पारवति पति हर- हर शम्भो ,पाहि-पाहि दातार हरे।
भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी,
निमिष मात्र में देते है नव निधि मनमानी शिव योगी।
सरल ह्रदय अति करुणा सागर अकथ कहानी शिव योगी,
भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर बनें मशानी शिव योगी।
                             स्वयं अकिंचन, जनमन रंजन पर शिव परम उदार हरे,
                             पारवति पति हर-्हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
आशुतोष इस मोहमयी निन्दा से मुझे जगा देना,
विषम वेदना से विषयो की मायाधीश चुड़ा देना।
रुप सुधा की एक बुंद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य ज्ञान भंडार युगल चरणों की लगन लगा देना।
                             एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद संचार देना।
                             पारवति पति हर-्हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
दानी हो दो भिक्षा में अपनी अनपायिनी भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की भक्ति प्रभो।
त्यागी हो दो इस असार संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
परम पिता हो दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो।
                                      स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुण पुकार हरे।
                                      पारवति पति हर-्हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
तुम बिन वेकल हूँ प्राणेश्वर आ जाओ भगवन्त हरे,
चरण-्शरण की बाहँ गहो हे उमारमण प्रिय कन्त हरे।
विरह व्यथित हूँ दीन दुखी हूँ दीनदयाल अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमन्त हरे।
                                      मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।
                                      पारवति पति हर- हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
नर्मदे हर , नर्मदे हर , नर्मदे हर  पाहि माम्।
नर्मदे हर, नर्मदे हर, नर्मदे हर   रक्ष माम् ।

Wednesday, 24 July 2013

गुरु महिमा


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः
                   ध्यान मूलं गुरु मूर्ति
                   पूजा मूलं गुरु पद्म
                   मंत्र मूलं गुरु वाक्यं
                   मोक्ष मूलं गुरु कृपा
नमो राम रमतीत नमो गुरुदेव स्वामी, नमो नमो सब सन्त नाम रटि भये जुबानी।
जिनके चरणौ हेठि रहे नित शीश हमारा, तन मन धन अरु प्राण करुं न्यौछावर सारा।
राम संत गुरुदेव बिन नही ओर आधार, रामचरण कर जोरि के वन्दे बारंबार।

Tuesday, 23 July 2013

चरम तत्त्व की खोज


उपनिषदों के ऋषियों को सबसे बड़ी अभिलाषा विश्व के तत्त्व पदार्थ को जान लेने की थी। संसार की विभिन्नताओं को एकता के सूत्र में बाँध लेने वाली कौन सी वस्तु है? एसी कोई वस्तु है भी या नही ? यदि है तो उस तक हमारी पहुँच कैसे हो ? हम विश्व तत्त्व को कहाँ खोजे?
विश्व के बाह्य पदार्थों तक हमारी पहुँच सीधी न होकर इन्द्रियों के माध्यम से है। अपनी सत्ता का हम प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते है। इसलिए विश्व तत्त्व की खोज हमे अपने मे ही करनी चाहिए। कुछ काल तक इधर- उधर घुमने के पश्चात उपनिषदों के ऋषि इसी निर्णय पर पहुँचे।अपनी इस यात्रा में वे कभी- कभी वायु, जल, अग्नि, आकाश, असत्, प्राण आदि पर रुके भी, परन्तु उनकी जिज्ञासा उन्हें आत्म- तत्त्व की ओर ले गई।
एक समय की बात है, एक बार इन्द्र और विरोचन दोनों ने प्रजापति के पास जाकर पुछा- आत्मा का स्वरुप क्या है ? इन्द्र देवताओं की ओर से, तथा विरोचन असुरों की ओर से गए।
प्रजापति ने कहा- यह जो आँख से पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है, या जो जल में और दर्पण में दिखाई देता है, वही आत्मा है। प्रजापति ने दोनों को अच्छे- अच्छे कपड़े पहनकर आने को कहा, जब वह सज- धज कर आए, तब प्रजापति ने उन्हें जलभरे मिट्टी के पात्र में झाँकने की आज्ञा दी, और पुछा- कि क्या देखते हो ? दोनों ने उत्तर दिया कि – सुंदर वस्त्र पहने अपने को ।‘
प्रजापति ने कहा- ‘यही आत्मा है।‘ ‘यह ब्रह्म है।‘                                                                                                                                                                                                                                                                              जो जरा –मृत्यु हीन है, जो शोक रहित है, जो सत्य संकल्प है।
विरोचन तो संतुष्ट होकर चला गया। किन्तु इन्द्र को संदेह बना रहा। उसने कहा- भगवन् यह आत्मा तो शरीर के अच्छा होने पर अच्छा लगेगा, परिष्कृत होने पर परिष्कृत  प्रतीत होगा, अंध होने पर अंधा इत्यादि। यह जरा- मरण- शून्य कैसे हो सकती है। ‘ प्रजापते ने दुसरी परिभाषा दी- जो आनन्द सहित स्वप्नों में घुमता है, वह आत्मा है।‘’  इन्द्र को फिर भी संतोष न हुआ। उसने कहा- भगवन् स्वप्न में सुख- दुख दोनों ही होते है, इसलिए स्वप्न देखने वाला आत्मा नही हो सकता। सदा बदलने वाली मानसिक दशाओं को आत्मा मानना संतोष जनक नही है।प्रजापति ने समझाया कि गहरी नींद में जो संपुर्ण सुख में सोता है, और स्वप्न नही देखता, वह आत्मा है। इन्द्र का अब भी समाधान न हुआ।उसने कहा- इसमें मुझे कोई सच्चाई नही दिखती।एसा जान पड़ता है कि सुषुप्ति दशा में आत्मा विनाश को ही प्राप्त हो जाता है।‘’ प्रजापति ने समझाने की चेष्टा की- शरीर की ही मृत्यु होती है, आत्मा की नही। इस अमृतमय अशरीर आत्मा को प्रिय और अप्रिय नही छुते।
                   न जायते म्रियते न विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न न बभूव कश्चित्
                   अजो नित्यः शाश्वतो अयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
अर्थात् – यह न कभी उत्पन्न होता है, न कभी मरता है। यह चैतन्य स्वरुप कभी , कहीं से नही आता । यह अज है, नित्य है, शाश्वत है, प्राचीन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नही मरता।
तत्त्व- पदार्थ का अर्थ ही यह है कि वह अनित्यों में नित्य रुप से अवस्थित हो, और बहुतों में एक हो।   इति।

Saturday, 20 July 2013

ऊँ अलौकिक अनुभूति


‘ऊँ’ शब्द का उच्चारण एक अलौकिक अनुभूति है। प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व ब्रह्म मुहुर्त में ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर बैठ जाए, फिर ‘ऊँ’ शब्द का उच्चारण करे, जितना लम्बा उच्चारण आप कर सकते है, कीजिए। आपको एक अलौकिक अनुभूति का अहसास  होगा।आपके अन्दर एक शक्ति पहले से विद्यमान है, दुसरी शक्ति सारे ब्रह्माण्ड में ,आकाश में विद्यमान है, और एक शक्ति ‘ऊँ’ का उच्चारण करने पर पैदा होती है।जब ये तीनों शक्ति आपस में टकराती है, तब एक नई ऊर्जा पैदा करती है। जो शक्ति आपमें पहले से मौजुद है, वह सुप्तावस्था मे होती है, धीरे-धीरे वह शक्ति जाग्रत होती है। और ऊँ शब्द का उच्चारण करने पर शरीर में एक नई स्फुर्ति , एक नई ऊर्जा उत्पन्न होती है।सूर्योदय से पूर्व जो समय होता है, वह ब्रह्म मुहुर्त कहलाता है, यह सबसे श्रेष्ठ समय होता है। इस समय किया हुवा उच्चारण सबसे अधिक फलदायी होता है। जब आप पुरी तरह तल्लीन हो जायेगे,फिर आप ‘ऊँ’ का बहुत लम्बा उच्चारण करें, धीरे- धीरे आपका शरीर ,सुक्ष्म शरीर पृथ्वी से ऊपर उठने लगेगा। तब आपको एक दिव्य, अलौकिक अहसास की अनुभूति होगी। एसी अनुभूति, जिसको आप सिर्फ महसुस कर सकते है. शब्दों में उसका बयान नही कर सकते। इससे मन प्रसन्न रहता है, शरीर में नई स्फुर्ति आती है, आपकी सोच सकारात्मक रहती है।अतः प्रतिदिन करीब ३० मिनट आप ईश्वर के समक्ष बैठकर ‘ऊँ’ शब्द का उच्चारण करे। बहुत जल्द आपको उसका प्रतिफल महसुस होगा।