Thursday, 1 August 2013

चारों वेदो के चार सुक्त


मनुष्य के पास शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा ये चार चीजे है, एवं इन्ही के लिए चार पुरुषार्थो की आवश्यकता है। शरीर के लिए अर्थ, मन के लिए काम, बुद्धि के लिए धर्म, एवं आत्मा के लिए मोक्ष चाहिए।इसका प्रतिपादन वेदों मे है।वेदों में क्या है? यह जिज्ञासा का विषय है। वेदों में जीवन का गुढ़ रहस्य छुपा हुआ है। वेद हमें जीवन जीने की कला सिखाते है।वेदों में सिर्फ धर्म ही नही बल्कि राजनीति, विज्ञान, अर्थशास्त्र ,गायन, वादनादि सभी का समुचित ज्ञान प्राप्त होता है। सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना थोड़ा मुश्किल काम है, अतः संक्षेप में वेदों को समझने के लिए चारों वेदों के चार सुक्त प्रस्तुत है-
                   अथर्ववेद का सांमनस्य सुक्त –एक मन
सह्रदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः
अन्यो अन्यमपि हर्षत वत्सं जातभिवाध्न्यः।
समान अन्त;करण और मन, द्वेष न करने का सुविचार।
करें परस्पर ज्यों गौं करती नवीन बछड़े पर शुभ प्यार।
अनुव्रतः पितुः पुत्रोः मात्रा भवतु वेमना।
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम्।
                   पुत्र पिता का अनुयायी हो, माता से हो उत्तम मन।
                   पत्नि पति से मधुसम मीठा, शान्तियुक्त बोले सुवचन।
मा भ्राता भ्रातरं द्विचन्, मा स्वसारमुत स्वसाः,
सम्यक् चःसव्रता भूत्वा वाचं वदतः भद्रयः।
                   बन्धु-बन्धु में द्वेष न हो, औ बहिन-बहिन में द्वेष न हो।
                   मिलकर एक ही कार्य करे, आपस में उत्तम भाषण हों।
येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः,
तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः।
                   जिसमें बिबुध विरोध न करते, द्वेष न आपस में करते।
                   यह वैदिक विज्ञान- ज्ञान , घर- घर में मानवहित करते।
ज्यायस्वन्तः चिधिनो मा हि यौष्ठ ,सैराधयन्तः सधुराश्चरन्तः
अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत,सघ्रींचीनान वः समन्स्कुर्वाणि।
                   शिष्टों के सह पंडित होकर , मिलकर कार्य सुसिद्ध करो।
                   कार्यधुरा को सिरपर लेकर, आपस में न विरोध करो।
                   आपस में मीठा भाषण कर, ध्येययुक्त आगे बढ़ना
                   उद्देश्य एक, एक मनयुक्त, सत्य ज्ञान सबको कहना।
समानी प्रपा सह वो अन्नभागः , समाने योक्त्रे स वो युनस्मि।
सम्यण्चो अग्निं सपर्यन्तारा,  नाभिमिवाभितः।
                   सबको समान प्याऊ हो, औ अन्नभोग सब हो बन्धन,
                   चक्रमध्य में ज्यो आरे हो, मिलकर करो अग्नि- अर्चन।
सघीचीनान् यः समनसस्कृत्योम्येक, सृष्टीन्सेवननेन सर्वान्।
देवा इवामृत रक्षमाणाः, सायंप्रातः सा मनसो वो अस्तु।
                   सब आपस में प्रेम करो, एक कार्य में लग जाओ।
                   एक ही विचार मन में रखना, एक संघ रखते जाओ।
                   मन में उत्तम विचार रखना, सायं प्रातः सब वैसे।
                   सुषा सुरक्षक देव एक मन में ही रहते हो जैसे।

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