श्री
भगवान ने कहा-
(१)अर्जुन
जड़ हें ऊपर जिसकी, अरु नीचे शाखा कहते है।
संसार रुप उस पीपल के, तरु को अविनाशी कहते है।
सब वेद है पत्ते जिस तरु के, यह जो नर तत्व जानता
है।
वह ज्ञानी जन सब वेदो का, संपूर्ण तत्व पहचानता
है।
(२)उस
वृक्ष की त्रिगुण रुप जल से, हें विषय रुप कोंपलवाली।
शाखा से उसकी बढ़ी हुई, नर कीटादिक योनि वाली।
नर योनि में कर्मो द्वारा, अर्हता ममता बन्धन
वाली।
नीचे ऊपर फैली जग में, है व्याप्त वासना जड़
वाली।
(३)यहाँ
रुप नही वैसा इसका, आधार से पाया जाता है।
नही अच्छी प्रकार से स्थित है, न ही आदि अंत
दिखलाता है।
वासना रुप भुतों वाले, संसार रुप पीपल तरु
को।
तू दृढ़ वैराग्य शस्त्र द्वारा, अब काट मुल से
इस तरु को।
(४)दोहा-
उसके पीछे परम पद, खोजे भली प्रकार।
जिसमें जाने से पुन;्नही पाते संसार।
विश्व पुरातन प्रवृत्ति का, जिससे
हें विस्तार।
उस ईश्वर की शरण हूँ, यह निश्चय ले
धार।
(५)नष्ट
हुवा मान मोह जिनका, आसक्ति दोष को जीत लिया।
आत्मा के बाच स्थित रहकर, सब कामनाओं का नाश
किया।
दोहा-
सुख दुख नामक द्वन्द से, मुक्त ज्ञानी हो जाय।
फिर अविनाशी परम पद, वह जन शीघ्रहि पाय।
(६)उस
स्वयं प्रकाश परम पद को, न ही सूर्य प्रकाशित कर सकता।
न ही चन्द्र और न ही अग्नि देव, है उसको भासित
कर सकता।
जिस परम
पद की प्राप्ति करके, नर पुनर्जन्म नही पाते है।
हे वह ही परम धाम मेरा, जहाँ ज्ञानी हरि जन जाते
है।
(७)इस
देह में जीव सनातन से, मेरा ही अंश कहलाता है।
प्रकृति में स्थित सब इन्द्रियों को, मन सहित
आकर्षण करता है
(८)जिस
प्रकार वायु पुष्पों की, हें सुरभि साथ में ले जाता।
वैसे तन तज इन्द्रियों संग, ले जीव दोसरे तन
पाता।
(९)त्वचा कान और आँख जीभ, संग नाक अरु मन को लेकर।
विषयों का सेवन करे जीव, इन सबका ही आश्रय
लेकर।
(१०)त्याग शरीर का करते हुवे, अथवा शरीर में रहते
हुवे।
भोगते हुवे भी विषयों को, या तीनों गुण से मुक्त
हुवे।
दोहा-जीव को वे नही जानते, अज्ञानी मति हीन।
ज्ञान नेत्र से बुध पुरुष, जाने तत्व प्रवीण।
(११)निज ह्रदय
में स्थित आत्मा को, योगी जन यत्न से जानते है
पर यत्न युक्त अज्ञानी जन, नही आत्मा को पहिचानते
है।
(१२)जो तेज पुंज रवि में स्थित है, सब विश्व प्रकाशित
करता है।
जो
स्थित है चन्द्र अरु अग्नि में, वह मेरा ही सब रहता है।
(१३)मै ही धरणी में कर प्रवेश, भुतों को धारण करता
हुँ।
अरु अमृत मय शशि होकर के, औषधि पुष्ट मै करता हुँ।
(१४)मै वैश्वानर अग्नि होकर, प्राणियों की देह
में रहता हुँ।
अरु प्राण अपान से युक्त हुवा, मै चतुर्विधि अन्न
पचाताहु
(१५)मै ह्रदय में सर्व प्राणियों के, सर्वज्ञ
रुप से रहता हुँ।
यह
स्मृति ज्ञान और अपोहन, सब मै ही करता रहता हुँ।
जानने
योग्य वेदों द्वारा, वेदान्त का भी मै कर्ता हुँ।
वेदों
का जानने वाला हुँ, अरु तत्वों का भी वेत्ता
हुँ।
(१६)दो प्रकार
के संसार बीच,्क्षर अक्षर पुरुष जो होते है।
उस्में
जीवात्मा अविनाशीसब भुत के तन क्षर होते है।
(१७)उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, त्रय लोक में व्याप्त
कहाता है।
सबका
धारण पोषण करता, अविनाशी ईश कहाता है।
(१८)जड़ वर्ग क्षेत्र से परे हुँ मै, अरु जीव से
उत्तम कहलाता।
इसलिये
लोक अरु वेदों में, पुरुषोत्तम प्रसिद्ध कहलाता।
(१९)इस प्रकार तत्वों से ज्ञानी, पुरुषोत्तम मुझे
जानता है।
वह सब प्रकार सर्वज्ञ पुरुष, मुझ वासुदेव
को भजता है।
(२०)निष्पाप पार्थ मैनें ऐसा, यह गुप्त शास्त्र
बतलाया है।
वह कृतकृत्य है ज्ञानवान, यह तत्व जिन्होंने पाया
है।इति
भजन
बृज
वासी नंद दुलारे, अवतार वेग लो प्यारे।टेक
भारत पर संकट
भारी, सब दुखी दीन नर नारी।
नित
तुमरी बाट निहारे।बृज……
गौवन को असुर
संहारे, हिय नेक दया नही धारे।
बहु
विनय करत हम हारे।बृज…….
ले चक्र सुदर्शन
कर में, फिर बना वीर घर घर में।
निज क्षत्रिय धर्म सिखारे।बृ…….
सत् धर्म की
बंसी बजा दें, वीरों के साज सजा दें।
अर्जुन सम शस्त्र सम्हारे।बृज…..
जगन्नाथ दास
तोहि टेरे, गौवंश बचा प्रभु मेरे।
दुष्टों के मुल नसारे।बृज…… इति श्री।
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