श्री
भगवान ने कहा-
(१)हे
महाबाहु फिर भी मेरे, तुम परम रहस्यमय वचन सुनो।
तुम अधिक प्रेम रखत्र मुझपर, अतएव कहुँ यह तत्व
सुनो।
(२)अर्जुन
मम जन्म विभुति को, सुरगण भी नही जानते है।
कारण हुँ देव महर्षि का, यह ऋषि गण नही मानते
है।
(३)जो
जन मेरे को अज अनादि, लोको का ईश जानते है।
वह पुरुषों में नर ज्ञानवान, सब पापों से हट
जाते है।
(४)दोहा-बुद्धि
ज्ञान अमुढ़ता, दुख सत्य दम शान्ति।
मन निग्रह सुख प्रसव भय, अभय और भव
शान्ति।
(५)संतोष
अहिंसा समता यश, अपकीर्ति दान तप जो होते।
एसे भुतों के नाना विधि, संपूर्ण भाव मुझ से
होते।
(६)सद्धावक
चार ऋषि व मन, सप्तर्षि आदि सन्तान हुई।
जिनकी जग में हें सर्व प्रजा, मेरे संकल्प से
प्रगट हुई।
(७)मम
विभुति और योग का जो, नर तत्व रुप से ज्ञाता है।
वह निश्चल इसमें संशय नही, योग में युक्त हो
जाता है।
(८)दोहा-
कारण हुँ मै विश्व का, सब जग मुझसे होय।
समझ उस तरह भक्तियुत , बुधजन भजते मोय।
(९)मन
प्राण लगे जिनके मुझ में, मम नित प्रभाव जानते हुवे।
रमते मुझमें संतुष्ट हुवे, आपस में मम गुण गाते
हुवे।
(१०)मम
ध्यान में लगे निरन्तर जो, अरु प्रेम सहित मोहि भजते है।
वह बुद्धि योग देता उनको, जिससे मम प्राप्ति
करते है।
(११)उन
भक्तो पर करुणा करके, मै आत्म भाव में स्थिर होकर।
करता हूँ तिमिर अज्ञान नष्ट, उर ज्ञान रुप
दीपक जो कर।
(१२)अर्जुन
ने कहा-
हरि परम ब्रह्म अरु परम धाम, अरु परम पवित्र
आप ही हो।
हो दिव्य सनातन आदि दैव , व्यापक अज पुरुष आप
ही हो।
(१३)देवर्षि
नारद असित न्यास, देवल ऋषी ने भी तुम्हेः कहा।
मेरी कल्याण कामना से, यह स्वयं आपने मुझे
कहा।
(१४)हे
केशव वचन आपके हम,, सब सत्य सर्वथा मानते है।
पर आपका सीता मय स्वरुप, न देव न दानव जानते
है।
(१५)सोरठा-
पुरुषोत्तम देवेश,्भूत प्रभव हे जगद् पति।
स्वयं आप भूतेश, निज से निज को
जानते।
(१६)दोहा-
जिन विभुतियों से प्रभों, रहे विश्व में व्याप्त।
सब विधि कहने योग्य हो, दिव्य विभुतिन आप।
(१७)मै
चिन्तन करता हुवा नित्य , किस विधि योगेश तुम्हें जानुँ।
किन किन भावो द्वारा भगवन्, मै रुप आपका पहचानूँ।
(१८)विस्तार
से कहिये निज विभुति, अरु योग भक्ति को हे भगवन्।
अमृत मय वचन आपके सुन, नही तृप्ति होय मेरी
भगवन् ।
(१९)श्री
भगवन् ने कहा-
दोहा- अब निज दिव्य विभुतियाँ, कहता तुझे प्रधान।
अन्त न मम विस्तार का, हे कुल श्रेष्ठ
सुजान।
(२०)हे
अर्जुन मै सब भुतों के , उर मध्य स्थित में आत्मा हूँ।
अरु सब भुतों का आदि मध्य, अरु अंत भी मै परमात्मा
हूँ।
(२१)मै
आदित्यों में विष्णु हूँ, ज्योतिन में किरण वाला रवि हूँ।
मै मरीचि वायु देवों में हूँ, अरु नक्षत्रों
में मै शशी हूँ।
(२२)वेदों
में हूँ मै सामवेद, देवों के मध्य इन्द्र मै हूँ।
मै सर्व इन्द्रियों में मन हूँ, भूतों में
ज्ञान भक्ति मै हूँ।
(२३)सब
रुद्रों में हूँ महादेव, दानव व यक्ष में घनद हूँ मै।
अष्ट वसुओं में मै अग्नि हूँ, गिरियों में
सुमेरु गिरि हूँ मै।
(२४)दोहा-जलाशयों
में सिन्धु हूँ, सेना निन में स्कन्द।
पुरोहितों में जान मोहि, बृहस्पति
वसुनन्द।
(२५)महर्षियों
में हूँ भृगु ऋषि, वचनों में एक अक्षर हूँ मै।
सब यज्ञों में जप यज्ञ हूँ मै, स्थिर में हिमालय
गिरि मै हूँ।
(२६)सब
वृक्षों में पीपल का वृक्ष,्देव ऋषियों में नारद मै हूँ।
मै चित्ररथ गन्धर्वो में हूँ, सिद्धों में
कपिल मुनि मै हूँ।
(२७)घोड़ों
में अमृत से उद्भव , वह उच्चै;श्रवा अश्व मै हूँ।
गजेन्द्रों बीच एरावत हूँ, अरु नरों बीच राजा
मै हूँ।
(२८)शस्त्रों
के बीच वज्र मै हूँ, गौवों में कामधेनु मै
हूँ।
संतान हेतु मै कामदेव, सर्पो में वासुकिराज
मै हूँ।
(२९)नागों
में हूँ ्मै शेषनाग,जलचरों का पति वरुण मै हूँ।
मै पितरों में अर्यमा पित्तर, यमराज शासकों
में मै हूँ।
(३०)गिनती
करने वालो में समय, अरु दैत्यों में प्रह्लाद मै हूँ।
अरु पशुओं में मृगराज हूँ मै, सब पक्षियों
बीच गरुढ़ मै हूँ।
(३१)पवित्र
करने वालों में वायु, मै राम शस्त्र धारियों में हूँ।
मछलियों में मै हूँ मगरमच्छ , नदियों में
श्रीगंगा मै हूँ।
(३२)अर्जुन
सुन सर्व सृष्टियों का,मै आदि अन्त अरु मध्य मै हूँ।
विद्याओं में ब्रह्म विद्या हूँ, अरु वादिजनों
में वाद मै हूँ।
(३३)अक्षरों
बीच मै हूँ अकार, समासों में द्वन्द समास मै हूँ।
मै अक्षय काल विराट रुप, धारण पोषण करता
मै हुँ।
(३४)मै
नाश करन वाला मृत्यु , होने वालों का हेतु मै हूँ।
स्त्रियों में कीर्ति श्री वाणी , स्मृति
मेघा धृति क्षमा मै हूँ।
(३५)मै
साम गान में वृहत्साम , छन्दों में छन्द गायत्री हूँ।
मै मार्गशीर्ष हूँ मासों में, ऋतुओं में बसन्त
ऋतु मै हूँ।
(३६)छल
करने वालों में हूँ जुवा, तेजस्वियों का तेज मै हूँ।
जग निश्चय वालों का निश्चय, सात्विकों का
सत्व भाव मै हूँ।
(३७)वृष्णि
वंशियों में वासुदेव, पाण्डवों बीच अर्जुन मै हूँ।
मुनियों में हूँ मै वेद व्यास, कवियों में
शुक्र कवि मै हूँ।
(३८)हूँ
दमन करने वालों में दण्ड, जय वालों की नीति मै हूँ।
मै गुप्त विचारों में हूँ मौन, अरु ज्ञानियों
में ज्ञान मै हूँ।
(३९)
हे अर्जुन सब ही भुतों का, कारण जो है वह मै ही हूँ।
एसा कोई चर अरु अचर नही, जिस भुत में भारत
मै नही हूँ।
(४०)मम दिव्य विभुतियों का अर्जुन, नही अन्त
किसी ने पाया है।
विस्तार विभुतियों का मैने, संक्षेप में तुम्हें
सुनाया है।
(४१)ऐश्वर्य
युक्त जो जो भी है, अरु कान्ति युक्त बल युत जो
है
मम अंश से तू उत्पन्न जान, उस उस को तुझसे
कही जो है।
(४२)अथवा
अब अधिक जान करके , तुमको क्या करना हें भारत।
मै एक अंश से सब जग को, धारण कर स्थित हूँ भारत।इति
श्री।
भजन
जो
भक्तजन अति प्रेम से, गीता के गुण को गावेगें।
संशय
रहित होकरके वह, भव वारिधी तर जायेगें।
क्लेश
उर से नष्ट होकर, क्रोध का होगा पतन।
निज
रुप में होकर मगन, निर्वाण पद को पावेगें।
संवाद
यह श्रीकृष्ण अरु , अर्जुन धनुर्धर वीर का।
पढ़ते
ही पढ़ते ब्रह्म में, तद्रुप हो मिल जावेगें।
यह
मानते सब विश्वजन , सत् कथन योगीराज का।
पाकर
अतुल बल आत्म का, निज धर्म में लग जायेगें।
श्री
व्यास जी के शब्द ने, भाषा में यह कविता रची।
जगन्नाथ
श्री प्रभु की कृपा से, जन्म अब नही पायेगें।इति श्री द. अ०।
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