श्री
भगवान ने कहा- (१) मैने यह अविनाशी योग, दिनकर को प्रथम बताया था।
दिनकर ने मनु को अरु
मनु ने, सुत इक्ष्वाकु को सुनाया था।
(२) यह परम्परा से हें अर्जुन, सब राजर्षि
ने जाना है।
पर बहुत काल से पृथ्वी पर, यह नष्ट हुवा ही माना
है।
(३) वो ही प्राचीन योग
तुमको, अति गोपनीय समझाया है।
मम भक्त सखा हो तुम प्रियंकर, इस कारण रहस्य
बताया है।
अर्जुन
ने कहा- (४) हरि जन्म आपका अभी हुवा,
दिनकर का जन्म पुराना है ।
कैसे मानूँ आदि में योग, भानु मे आपसे जाना
है।
श्री
भगवान ने कहा- (५)दोहा- तेरे अरु मेरे सखा,
बीते जन्म अनेक ।
मै तो सबको जानता, तू नही जाने एक।
(६) मै हूँ अजन्मा अविनाशी,
अरु ईश्वर सब प्राणी का हूँ।
तो भी निज प्रकृति में स्थिर हो, माया से प्रगट
मै होता हूँ।
(७) जब जब धर्म की हानी
और, अधर्म का बहु प्रचार होता।
तब तब ही मैं निज रुप को ले, हे भारत स्वयं
प्रगट होता।
(८) साधु पुरुषों की
रक्षा हित , दुष्टों को वध करने के लिये।
युग युग में जन्म मैं लेता हुँ, सद्धर्म वृद्धि
करने के लिये।
(९) हें जन्म कर्म मेरे
ये दिव्य, इस भाँति तत्व का ज्ञाता है।
वह तन को तज लेता न जन्म,
किन्तु मुझको ही पाता है।
(१०)जो राग द्वेष भय
क्रोध त्याग, तन्मय होकर मम शरण हुवे।
वह पुरुष ज्ञान तप से पवित्र, होकर मम रुप को
प्राप्त हुवे।
(११) जो नर जिस भाव से
मुझे भजे, मैं उस प्रकार फल देता हुँ।
हे पार्थ पथिक
सब पथ से ही , मुझ तक आते मैं लखता हूँ।
दोहा- (१२) कर्म के फल की चाह से, सुरगण पुजे जाय ।
मृत्यु लोक
में शीघ्र ही, कर्म सिद्धी को पाय।
(१३) गुण और कर्म के
भेदों से , इन चार वर्ण के भाग किये।
ब्राह्मण क्षत्रिय
अरु वैश्य शुद्र , मैने ही सब उत्पन्न किये।
यद्यपि मैं उनका कर्ता हूँ, तो भी अविनाशी
अकर्ता हूँ।
मुझ को श्रम
आदि विकार नही, इसलिये कर्म नही तजता हूँ।
(१४) न ही कर्म बाँध सकते मुझको, न कर्म के पल हम
चाहते है।
जो इस प्रकार
जाने मुझको, वह बन्धन में नही आते है।
(१५) यह तत्व प्रथम जानकर
भी, हे मुमुक्षु जनों ने कर्म किया।
इस से तुम भी
वह कर्म करो, पुरखों ने प्रथमहि जिसे किया।
(१६) हे कुन्ती पुत्र
कर्म क्या है, अरु अकर्म किसको कहते है।
इस विषय में
पण्डित जन सारे, सर्वथा विमोहित रहते है।
दोहा-उन कर्मो का तत्व
मै, तुझे कहुँगा वीर ।
जिसे जान भव बन्ध को , तोडेगा मति धीर।
(१७) कर्म अकर्म विकर्म है, तीनो को तू जान ।
कर्मो की गति
गहन है, अर्जुन ले पहिचान ।
(१८) जो प्रारम्भिक कर्म
में , देखे आतम ज्ञान ।
आत्म ज्ञान में कर्म ही, अपना हेतु मान ।
(१९) वह जन तत्वज्ञ मनुष्यों
में, अति बुद्धिमान कहलाता है।
सब कर्मो को करने वाला, वह योगी श्रेष्ठ कहाता
है ।
(२०) संकल्प रहित वो
होते है, जिस नर के मित्र उद्योग सभी ।
हो ज्ञानानल
में कर्म भस्म, पण्डित जन उसको कहे सभी।
(२१) तज कर्म के फल की
आसक्ति , पर ब्रह्म रुप में तृप्त रहे।
वह सर्व कर्म
को करके भी, कुछ नही करता ही बना रहे।
(२२) जिसने जीता मानस
शरीर, सामग्री भोगों की त्यागी।
वह आशा रहित
पुरुष केवल, शारीरिक कर्म का हें भागी।
दोहा- ऐसा कर्ता कर्म
का, कर्म में लिप्त न होय।
उसे पाप लगता
नही, मूल तत्व कहूँ तोय।
(२३) जो दैव योग से प्राप्त
होय, उसमे ही तृप्त जो रहता है।
स्वार्थ सिद्धि
के लिये कभी, उद्योग न करता रहता है।
(२४) जो हर्ष शोक द्वन्द्वो
से रहित, नही द्वेष किसी से करता है।
हे सिद्धि असिद्धि
समान जिसे, वह नही कर्म में बधँता है।
(२५) नर जो आसक्ति रहित
होता, ज्ञान में स्थिर मन वाले के।
सम्पूर्ण कर्म
नष्ट होते, मख हेतु आचरण वाले के।
(२६) जो यज्ञ पात्र अरु
मख हवि को, पर ब्रह्म रुप ही जानता है।
वह ब्रह्म रुप
अग्नि मे ब्रह्म , कर्ता के हवन को मानता है।
दोहा- ब्रह्म रुप जो
कर्म में , समाधिस्थ नर होय।
उसको प्राप्ति
योग्य जो, ज्ञान ब्रह्म पद होय।
(२७) दुसरे योगी देवों
के लिये, पूजन के रुप मख करते है।
ब्रह्मानल में
मख द्वारा ही, कोई हवन यज्ञ को करते है।
(२८) श्रोत्रादिक सर्व
इन्द्रियों को, कोई तो नैष्टिक योगी जन ।
वह संयम रुपी
अनल बीच, करते विषयों को आप हवन।
कितने ही दुसरे
योगी जन, यज्ञादिक भोगों को लेकर।
वह इन्द्रिय
रुपी अनल बीच, लय करते विषयों को लेकर।
(२९) ज्ञान से प्रकाशित ईश्वर में, अरु स्थिति
रुप योगानल में।
इन्द्रिय अरु प्राण के कर्मो को, कोई हवन करे
आतम बल में।
(३०) कोई ईश्वर अर्पण बुद्धि से, धन जग के
हित व्यय करते है।
ऐसे ही धर्म के पालन हित, तप रुप यजन को करते
है।
कोई
योग यजन करने वाले, कुछ कठिन व्रतों को करते है।
कोई यत्न शील प्रभु प्राप्ति हित, अध्ययन रुप मख करते है।
(३१) कोइ जन
अपान वायु में, निज प्राण वायु को हवन करे।
ऐसे
ही प्राण वायु में कोई, वायु अपान को हवन करे।
दोहा- अन्य
योगी जन प्राण अरु , रोक के गति अपान।
प्राणायाम
परायण , होते चतुर सुजान ।
(३२) कोई अहार नियमित करके, प्राणों में प्राण हवन
करते ।
मख
द्वारा पाप नाश जिनका , वह सभी यजन ज्ञाता रहते।
(३३) अर्जुन मख के परिणाम रुप , जो ज्ञानामृत भोगने
वाले।
पर
ब्रह्म सनातन को पाते, वह योगी भव तरने वाले ।
हे यज्ञहीन
जो नर उसको, यह लोक नही सुखदाता है ।
क्या और लोक
की बात कहें, वह कही नही सुख पाता है।
(३४) इस प्रकार मख बहु
भाँति सखे ,विस्तार वेद में वर्णित है।
व सब शरीर मन
इन्द्रियों की , उत्पन्न क्रिया द्वारा नित है।
(३५) इस तरह तत्व से
जान इन्हें, तुम कर्म योग निष्काम करो।
जग के बन्धन
से मुक्त होय, आत्मा के बीच विश्राम करो।
(३६) सांसारिक वस्तुओं
से अर्जुन, जो यज्ञ सिद्ध हो जाते है।
इन सबकी अपेक्षा
ज्ञान यज्ञ , अत्यन्त श्रेष्ठ कहलाते है।
क्योकि संपूरण कर्म मात्र, ज्ञान में समाप्ति
होते है।
सब यज्ञादिक कर्मो के फल, ज्ञानी को बिन श्रम
होते है।
(३७) निष्कपट प्रश्न
अरु सेवा से, ज्ञानी को दण्डवत करने से।
देगें उपदेश
तत्वदर्शी , जानेगा ज्ञान तू सुनने से।
दोहा- मोह नही होगा तुझे,
पढ़कर ऐसा ज्ञान।
मुझ में तुझ
में विश्व में,देखे जीव समान।
(३८) यदि सब पापियों से भी अधिक, तू पाप कर्म कर्ता
होगा।
तो ज्ञान रुप
नौका द्वारा, पापों से सर्व पार होगा।
(३९) प्रज्वलित हुवा
अनल जैसे, ईधन को भस्म कर देता है।
वैसे ही अर्जुन
ज्ञानानल , सर्व कर्म दग्ध कर देता है।
(४०) इस जग में ज्ञान
के सम कोई, न ही पावन मुझे दिखाता है।
वह ज्ञान समय
में अपने आप, योगी आत्मा में पाता है।
(४१) जितेन्द्रिय तत्पर
हुवा पुरुष, श्रद्धा से ज्ञान को पाता है।
ज्ञान को प्राप्त
होकर तुरंत, वह परम शांति को पाता है।
(४२) जो संशय युक्त श्रद्धा
से हीन, वह नर विनष्ट हो जाता है।
दोनों लोको
में सौख्य नही, वह भ्रष्ट मनुज हो जाता है।
(४३) सम बुद्धि रुप योग
द्वारा , प्रभु अर्पण कर्मों को किया।
अरु ज्ञान के
द्वारा जिस नर ने, सब ही संशय को नष्ट किया।
दोहा- ऐसे आतमवान को , कर्म बन्ध नही होय ।
होय परायश ईश
में, जन्म मरण दे खोय।
(४४) इस कारण ही भारत
अब तू, शुभ कर्म योग में स्थिर होजा।
अज्ञान से संशय
ह्रदय हुवा, उसको तज प्रियवर स्थिर होजा।
दोहा- ज्ञान रुप सत् खड्ग से, संशय काटो वीर।
रण करने को
खड़ा हो, बल शाली मति धीर।
भजन
इस ज्ञान कर्म ही को, जग में प्रधान
देखा ।
कर्तव्य कर्म करना, इसको ही धर्म
देखा ।
ऋषियों ने शुभ कर्म कर, उर ब्रह्म देख पाया।
पर पाप पूर्ण नर को , मिट्टी में मिलते देखा। इस ज्ञान ……..
जो क्षत्रिय रण विमुख हो, कायरता उर में
लाता ।
उस वीर का कलंकी, जन में ही नाम देखा । इस ज्ञान……….
सत् जन प्रतिज्ञा करके, संकट से है न डरते।
कुल धर्म पर निछावर , निज प्राण करते देखा।
इस ज्ञान……..
तुमको भी इस समय में, लड़ना ही रण में होगा।
नही तो तुम्हारा जग में, कायर में होगा लेखा
। ईश ज्ञान….
श्रीकृष्ण के वचन को, धीरो जग विचारो ।
बिन आत्म बल बढ़ाये, उद्धार ही न देखा।इस
ज्ञान………..इति श्री
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