संजय ने कहा-अश्रु पुर्ण लोचन दोऊ, करुणा करके
व्याप्त।
शोक युक्त अर्जुन प्रति, वचन कहा प्रभु आर्य।
श्री भगवान ने कहा- हे अर्जुन इस विषम स्थल में,
यह मोह तुझे क्यों होता है।
यह है आचरण अनार्यो का,
जो स्वर्ग ओ यश को खोता है।
(३) हे वीर पार्थ यह आचरण , तुमको
शोभा नही देती है ।
यह तुच्छ ह्रदय की दुर्बलता, बल हीन पुरुष में
रहती है।
(४) इसे त्यागकर परन्तप, खड़े होऊ मति धीर।
धनुष बाण लो हाथ में,
रण हित तुम बल वीर।
अर्जुन ने कहा- (५)हे मधुसुदन गुरु द्रौण और, श्री भीष्मपितामह
से कैसे।
बाणों से रण में युद्ध करुँ, इन पुज्यवरों से
मैं कैसे।
(६) न मार के इस संसार बीच, इन
महानुभावों गुरुजन को।
भिक्षान्न भोगना उचित यहाँ, लगता है प्रिय कर
मम मन को।
इन गुरुजनों को मार के भी, इसके ही रक्त में
रंगे हुए।
भोगुँगा इन ही भोगों को, जो काम अर्थ में सने
हुए।
(७) जय और पराजय निर्णय में, बुद्धि
समर्थ नही मेरी है।
कौनसा पथ है श्रेष्ठ हमें? असमंजस मे मति मेरी
है।
जिनको हम मार के जीना भी, है कृष्ण
कभी नही चाहते है।
हे नृप धृतराष्टृ भुवन सारे, है
सन्मुख खड़े दिखाते है।
(८)कायरता जन्य दोष करके, क्षत्रिय स्वभाव मम नष्ट हुवा।
हो धर्म विषय में मोहित चित्त,
पुछता आपसे भ्रमित हुवा।
जो कुछ भी निश्चय किया हुवा, हितकारक
जो साधन होवे।
मैं शरणागत हूँ शिक्षा दो, जिसको
सुन शिष्य अभय होवे।
(९)निष्कंटक वैभव युक्त भुमि, पा सुरेश भी मैं बन जाऊँ।
इन्द्रिय का शोक शमन कारक, जब तक उपाय नही पा
जाऊँ।
संजय ने कहा-(१०)हे
राजन् श्री ह्रषिकेश प्रति , तब गुह्यक्लेश से स्पष्ट कहा।
गोविन्द नही मैं करुँगा
रण, यह कह करके वह मौन रहा।
(११)हे राजन् दोनों सैन्य बीच
, अर्जुन को शोकग्रसित देखा।
ह्रषिकेश देखकर बोले, जब उसको ज्ञानरहित देखा।
श्री भगवान ने कहा- (१२)हे भारत तुम
तो निज मुख से, बहु ज्ञान की बातें करते हो।
अनुचित
है जिसका शोक सखा, उसका ही शोक तुम करते
(१३)जिन
जन के प्राण गये उनका, पण्डित जन शोक न करते है।
जो
जीवित नर है उनका भी, वह शोक कभी नही करते है।
(१४)ना
तो ऐसा ही है अर्जुन , जो किसी काल में मै नही था।
या तुम भी कभी न थे जग में ,यह नृप समाज कोई
नही था।
या इस आगे हम सब न रहे, ऐसा भी कभी न होवेगा।
जो आदि से होता आया, अर्जुन वैसा ही होवेगा।
दोहा-जीव
आत्मा जिस तरह, बालापन तरुणाय।
वृद्ध
अवस्था भोगता, इस शरीर के माय।
दुसरा शरीर भी वैसे ही , जीव को प्राप्त किया होता है।
यह
तत्व जानकर वीर पुरुष, तन पर मोहित नही होता है।
(१५)हे
कुन्ती पुत्र यह शीत उष्ण, दुख सुख जो नर को होते है।
संयोग
से इन्द्रिय विषयों के, क्षणभंगुर यह सब होते है।
यह
हे अनित्य अरु नाशवान, तुम धीरज धर कर सहन करों।
आत्मा
को अमर जान करके, हिय अचल ब्रह्म का ध्यान धरों।
(१६)
ज्ञानी को सुख दुख दोनों ही,इक रुप समझ में आते है।
जिर्हि
व्यथित विषय नही करता है, वे मोक्ष योग्य हो जाते है।
(१७)नहि
हें अभाव सत् वस्तु का, अरु असत्य का अस्तित्व नही।
ज्ञानी
पुरुषों ने देखा है, इन दोनों का सब तत्व सही।
(१८)तु नाश रहित तो
उसे जान, जिससे सब व्याप्त विश्व रहता।
इस
अविनाशी के विनाश का, कोई भी सामर्थ्य नही रखता।
(१९)
अप्रमेह जीव अविनाशी के ,यह सब तन नाशवान जानों
इसलिए
पार्थ तुम युद्ध करों,तज शोक वचन मेरा मानो।
(२०)
जो मरा आत्मा को माने, अरु मारक इसे समझता है।
दोनों नही जानते है, यह नही मारता मरता है।
(२१)यह
आत्मा जन्म नही लेता, नहि तीन काल में मरता है।
नही
होगा अथवा हुवा कभी, सब समय अजन्मा रहता है।
यह
नित्य निरन्तर हें प्यारे, सर्वथा सनातन रहता है।
अरु
देह नाश होने पर भी, यह अविनाशी ही रहता है।
(२२)नित्य
अजन्मा अरु अव्यय, जो इसको पुरुष जानता है।
मानव
कैसे मरवाता, अरु कैसे किसे मारता है।
(२३) जैसे नर जीरण वस्त्र त्याग,्नूतन पट धारण करता है।
यह
उसी प्रकार आत्मा भी, जीरण तन नया बदलता है।
(२४)आत्मा
को शस्त्र न काट सके, नही आग जला भी सकती है।
अरु
नही गला सकता पानी,नही हवा सुखा भी सकती है।
(२५)यह
कटता है नहि जलता है, नहि गलता है न सुखता है।
यह
स्थावर नित्य सर्व व्यापी, जो अचल सनातन रहता है।
(२६)दोहा-है
अव्यक्त यह आत्मा, अरु अचिन्त्य अविकार्य।
इसको ऐसा जानकर , शोक करे मत आर्य।
(२७) यदि जन्म मरण होता इसका, हें महाबाहु ? ऐसा जाने।
तो भी तु शोक के योग्य नही, क्यों वृथा बात लेकर
माने।
(२८) जो जन्मा हैं वो मरेहिगा, अरु मरा जन्म फिर लेवेगा।
अनिवार्य अर्थ में शोक तुन्हें , किस प्रकार शोभा
देवेगा।
(२९) हें भारत । संपूरण प्राणी, जन्म से प्रथम बिन
शरीर थे।
मरने के बाद भी बिन तन के, बीच में दिखाते शरीर
वे।
दोहा- ऐसे तन का हें सखे, आत्म विषय क्या शोक ?
इसी मोह के वेग को, बुद्धि ज्ञान से रोक ।
(३०) कोई पुरुष इस आत्मा को, आश्चर्य युक्त हो देखता
है।
अरु
कोई जन आश्चर्य युक्त, इस आत्म तत्व को कहता है।
अन्य
मनुष्य इस आत्मा को, आश्चर्य पूर्वक सुनता है।
अरु
कोई मानव सुनकर भी, आत्मा को नही जानता है।
(३१)
हें भारत यह आत्मा सबके, वध रहित सदा ही है तन में।
इसीलिये
सर्व भुतों के हित , तू शोक वृथा करता मन में।
(३२)
सत् धर्म को अपने लख करके, भय करना तुझको योग्य नही।
क्षत्रिय
के लिये रण से बढ़कर , कल्याण प्रद कर्तव्य नही।
(३३)
यह अनायास रण मिला तुझे, जो खुले स्वर्ग का द्वारा हैं।
यह
पाते बढ़भागी क्षत्रिय, जिनको कल्याणहि प्यारा हैं।
दोहा-
धर्म युक्त संग्राम को, यदि न करे मति धीर।
खो स्वधर्म
औ कीर्ती, पाप लगेगा वीर।
(३४)अरु तेरा अपयश इस
जग में, नर बहुत काल तक भोगेंगे।
यह अपयश तुझ
सम्मानित को, मृत्यु से अधिक हो जायेगें।
(३५) जिनके तू बहुत माननीय है, वे तुच्छ तुझे सब मानेगे।
रण से भय खाकर
विमुख हुवा, वे महारथी जन जानेगें।
दोहा- वे तेरी कटु वचन को , पार्थ ? कहेगे तोय।
निंदा से बढ़कर अधिक , दुख क्या जग में होय।
(३६)
सुरलोक मरण से पावेगा, भोगेगा पृथ्वी को जग में।
इसलिये खड़ा हो जा रण हित, हे वीर धनण्जय निश्चय
से।
(३७) जय और पराजय सुख
दुख को, अरु हानि लाभ को सम जानो।
फिर हो जाओं
रण हित खड़े,न हि पाप लगेगा सच मानो।
(३८) हे भारत यह बुद्धि तुमको, निज साँख्य विषय में गई
कहाँ।
इसको ही अब
निष्काम कर्म, योग के विषय में कहें सही।
(३९) दोहा- जिस बुद्धि से युक्त हो, उर का मेटे त्रास
।
सब
कर्मो के बन्ध का, कर डालेगा नाश।
(४०) प्रारब्ध कर्म का तो अर्जुन, यहाँ नाश कभी नही होता
है।
विपरित दोष
फल उस जन को, सुन सखा कभी नही होता है।
यह कर्म योग धर्म का जो, थोड़ा साधन कर
लेता है।
वह जन्म मृत्यु
रुपी भय से , उद्धार शीघ्र कर देता है।
(४१) निश्चयात्मक बुद्धि अर्जुन, कल्याण मार्ग में एक ही है।
अज्ञानी को
बहु भेद युक्त, मतियाँ अनेक ही रहती है।
(४२) तत्व वेदों के वचनों में, जो बात बढ़ाकर कहते है।
इसके अतिरिक्त
नही कुछ भी, ऐसा अज्ञानी कहते है।
(४३) हे पार्थ सकामी
कहते है, कर्म से जन्म सुख मिलता है।
इस जग में उनको
यश मिलकर , अन्त में स्वर्ग सुख मिलता है।
(४४) इस वाणी द्वारा हारे हुए, मन की मति भोग में रहती
है।
निश्चय कारक
उनकी बुद्धि, फिर समाधिस्थ नही रहती है।
(४५) वे तीनो गुण से वेद भरे, तुम तीनो गुण से परे रहो।
निर्द्वन्द
नित्य सत्वस्थ बनो, निज आत्म तत्व से भरे रहो।
(४६) हें चारो और भरा
जब हो, तब कुप से कितना कार्य चले।
उन जन को बस
उतने ही, होते है ज्ञान में वेद भले।
(४७) अधिकार कर्म में
ही तेरा, फल में कुछ भी अधिकार नही।
मत बने कर्म
फल का हेतु, कर्तव्य कर्म को त्याग नही।
(४८) तुम योग युक्त हो कर्म करो, आसक्ति को तजकर अर्जुन।
सम जानों सिद्धि
असिद्धि को, क्योंकि हें साम्य योग अर्जुन।
(४९) इस बुद्धि योग से
काम्य कर्म , अत्यन्त तुच्छ ही हें जानों।
बुद्धि का आश्रय
ग्रहण करों, फल वासना अति कृपण मानों।
(५०) सम बुद्धि मनुज के दोनों ही, वे पाप पुण्य जल जाते
है।
इसीलेये योग
से युक्त रहो, शुभ कर्म योग कहलाते है।
(५१) जो बुद्धि योग युक्त जन हें, कर्मो के फल नही चाहते
है।
वह जन्म मुक्त
हो बन्धन से, दुख रहित परम पद पाते है।
(५२)जिस काल मोह दल दल
से हो , मति तेरी पार हो जावेगी।
तब श्रवणो चित
श्रुत विराम से, तेरी मुक्ति हो जावेगी।
(५३)श्रुति के मिथ्यान्त
से भ्रमित मति, प्रभु के स्वरुप में स्थिर है।
तब योग समस्थ
प्राप्त होगा, निज रुप में मति अचल है।
(५४) अर्जुन ने कहा-केशव
जो नर समाधिस्थ, निज बुद्धि को स्थिर रखते
उन पुरुषों
का क्या लक्षण है, अरु वृत्ति कैसी रखते है।
दोहा-कैसे नर वह बोलते,
कैसी चलते चाल।
किस प्रकार
वह बैठते,कहिये दीन दयाल।
श्री भगवान ने कहा-
(५५) हे अर्जुन जब निज
के मन के , सब काम मनुज तज देता है।
परमात्मा से
आत्मा तुष्ट हुवा, वह स्थिर बुद्धि कहलाता है।
(५६)जो दुख से दुखी न
होता है, ना सुख में हर्ष मनाता है ।
वह नर भय प्रीति
–क्रोध त्याग, स्थिर बुद्धि मुनि कहाता है।
(५७)नहि हर्ष न शोक न
मोह को, शुभ अशुभ वस्तुओं को पाकर।
है उसकी बुद्धि
स्थिर अर्जुन, यह भेद कहुँ में समुझाकर।
(५८)या अपने सब अंगों
को , जिस भाँति समेट लेता है।
इन्द्रियों को उनके विषयों
से, नर वैसे समेट लेता है।
(५९) दोहा- तब बुद्धि उस पुरुष
की, निश्चय से स्थिर होय।
आत्मा का अनुभव
करे, जन्म मरण दे खोय।
(६०) इन्द्रियों के द्वारा विषयों
को, नर त्यागन भी कर देता है।
निर्वृत विषय हो जाते
है, पर राग बना ही रहता है।
इस जन के उर का राग निवृत
, हरि के चिन्तन से होता है।
साक्षातकार करके प्रभु
का, वह निवृत राग से होता है।
(६१)बलवान इन्द्रियाँ बुध जन की,
बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है।
प्रयत्न बहुत करने पर
भी, बुध जन का मन हर लेती है।
(६२) उन सब इन्द्रियों का संयम
कर, जो मुझ में चित्त लगाता है।
इन्द्रियाँ होय जिसके
वश में, स्थिर बुद्धि वही कहाता है।
(६३) विषयों का चिन्तन करने से
, आसक्ति उनमें होती है।
अरु आसक्ति से विषयों
की, उन्पन्न कामना होती है।
कामना
अधिक बढ़ने से ही, उत्पन्न क्रोध हो जाता है।
अत्यन्त क्रोध के बढ़ने
से, अविवेकी उर हो जाता है।
अविवेकी की स्मरण शक्ति
भी, निश्चय ही भ्रमित हो जाती है
सुमति भ्रमित हो जाने से, शुभ बुद्धि
नाश हो जाती है।
दोहा- बुद्धि नाश के होत ही, सर्व
नाश हो जाय।
इसीलेये इनके सभी, भेद
कहे समझाय।
(६४)स्वाधीन मनोवृत्ति वाला, अरु
राग द्वेष से रहित हुवा।
निज वश में करके इन्द्रिय
को, सब भोगों को भोगता हुवा।
अपने मानस की वही पुरुष,
फिर प्रसन्नता को पाता है।
निज बुद्धि स्थिर हो
उसी समय, वह ज्ञानी नर हो जाता है।
(६५)इस निर्मलता के होने से, नर
का सब दुख मिट जाता है।
शीघ्र ही बुद्धि स्थिर
होती है, अरु मन प्रसन्न हो जाता है।
(६६)साधन से हीन पुरुष की फिर
, अति श्रेष्ठ बुद्धि नही रहती है।
अरु उस अयुक्त के मानस
में ,आस्तिकता भी नही रहती है।
अरु आस्तिक भाव बिना
जन को, सुख शांति भी नही होती है।
अरु शांति बिना सुख की
आशा, हें अर्जुन किसको होती है।
(६७) जैसे पानी में नौका को, वायु
विनष्ट कर देता है।
इन्द्रियाँ हुई मन के
वश तो, बुद्धि का बल नही रहता है।
(६८) महाबाहु इन्द्रियाँ जिसकी,
हर प्रकार वश में होती है।
उस योग युक्त नर की अर्जुन
, फिर बुद्धि स्थिर भी होती है।
(६९) सब जीवों की जो रजनी है, जागते
योगी जन उसमें है।
क्षण भंगुर प्राणी जाग्रत
हो, उसको मुनि निशा मानते है।
(७०)जैसे स्थित पूरण वारिधि में,
सब जल के वेग समाते है।
वैसे ही स्थिर बुद्धि
जन में, बिन विकार भोग समाते है।
वह पुरुष परम शांति पद
को, शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
भोगों का चाहने वाला
जन, उत्तम पद को नही पाता है।
(७१) निर अहंकार कामना रहित, जो
सर्व कर्म का करता है।
निस्पृहा वर्तता निर्मोही , वह शान्ति लाभ भी करता है।
(७२) यह ब्रह्म प्राप्ति वाले जन
की, जो मैने स्थिति बताई है।
इसको पाकर होता न मोह,
वह विधि तुम्हें समझाई है।
दोहा- यह निष्ठा स्थिर होय जो,
अन्त काल के माय।
पार्थ ब्रह्म निर्माण
को, वह जन शीघ्र ही पाय।
भजन
श्रीकृष्ण ने ज्ञान बताया है, गाण्डीव
धनुर्धर पारथ को।
उर आतम दर्श कराया है,अपने अति
प्यारे भारत को ।
मोह जाल अविद्या दुर करी, सत् ज्ञान
में बुद्धि प्रवीण करी।
वचनामृत पान कराया है, गाण्डीव
धनुर्धर पारथ को।
जो स्वप्न में सृष्टि रचता है,
वह नष्ट उसेही करता है ।
वह दिव्य रुप दिखलाया है, गाण्डीव
धनुर्धर भारत को ।
जो पांच तत्व में रहकर भी, न ही
दर्श किसी को देता है ।
वह व्यापक रुप बताया है, गाण्डीव
धनुर्धर भारत को ।
सब विश्व बीच क्षर वस्तु है, परिवर्तन
इसका होता है ।
अक्षर ही ब्रह्म बताया है, गाण्डीव
धनुर्धर पारथ को ।
तूही है ब्रह्म अखंड रुप, अविनाशी
अचल अरुप तूही ।
यह वेद का सार सुनाया है, गाण्डीव
धनुर्धर भारत को ।
कवि जगन ने कृष्ण कृपा से यह, सत्
ज्ञान गुरु से पाया है ।
जो गीता में दिखलाया है, गाण्डीव
धनुर्धर भारत को ।
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