से
अर्जुन ने कहा-
(१)यदि कर्मो से प्रभु आप मुझे,
यह ज्ञान श्रेष्ठ बतलाते है ।
तो फिर क्यों यह मुझसे माधव, अति घोर कर्म करवाते
है।
(२) क्यों मिली हुई बाते कहकर
, मति मेरी मोहित करते हो।
कल्याण प्राप्त होवे जिससे, वह उपाय क्यों नही
करते हो ।
श्री भगवान ने कहा-
(३) हें पाप रहित ? मैने जग में
, निष्ठा दो भांति बताई है ।
ज्ञानी ने ज्ञान योग द्वारा, योगी कर्मयोग से
पाई है ।
(४)नर कर्मो के नही करने से, निष्कर्म
नही हो जाता है।
अरु कर्मो के त्यागन से भी, न ही प्रभु की सिद्धी
पाता है।
(५) क्योंकि क्षण मात्र कोई भी
जन, बिन कर्म किये नही रहता है।
प्राकृतिक गुणों से विवश
हुवा, कर्मो को करता रहता है।
(६) वश करके कर्म इन्द्रियों को,
मन से विषयों को ध्याता है।
वह ज्ञानी जन से मुढ़ पुरुष , मिथ्याचारी कहलाता
है।
(७) मन से इन्द्रियों को वश करके,
अरु अनासक्त होकर अर्जुन।
कर्मेन्द्रिय द्वारा कर्म योग , करता वह पुरुष
श्रेष्ठ अर्जुन ।
(८)तु शास्त्र युक्त कर्मो को कर,
नही करने से अच्छा करना।
बिन कर्म किये अर्जुन तेरा, नही होय सिद्ध तन
का धरना।
(९) यज्ञ के कर्म से भिन्न कर्म, होते बन्धन के है कारण
।
कौन्तेय कर्म फल को तजकर , यज्ञार्थ
कर्म तु कर धारण ।
(१०) कल्प के आदि में ब्रह्मा ने,
मख सहित प्रजा को रच करके।
यह कहा तुम्हारी वृद्धि
हो, इस धर्म युक्त ही मख करके।
यह यज्ञ तुम्हारी इच्छाएँ
, पूरण करने वाला होवे।
यह शुभ मारग संसार बीच
, सब को अति सुखदायक होवे।
(११) इस मख द्वारा तुम देवों की,
उन्नति करके संतुष्ट करो।
उत्कर्ष तुम्हारा देव
करे, कल्याण परस्पर प्राप्त करो।
दोहा- मख से हो संतुष्ट सुर, देगें
इच्छित भोग।
दाता बिन भोगे उसे, चोर
कहे सब लोग।
(१२) यज्ञ से शेष जो बचा अन्न,
कोई भी सज्जन खाता है।
वह सब पापों से मुक्त
होय, अरु अति उत्तम पद पाता है।
अपने शरीर पोषण के लिये,
जो भोजन पुरुष बनाता है।
वह पापी जन इस कारण से,
निज पापों को ही खाता है।
(१३) उत्पत्ति सर्व प्राणियों की,
अन्न से विश्व में होती है।
उत्पत्ति अन्न की वृष्टि
से, अरु वृष्टि यज्ञ से होती है।
उत्पन्न होय कर्मो से
मख, अरु ब्रह्म से कर्म प्रगट होता है।
उत्पत्ति वेद की अक्षर
से, वह अक्षर नष्ट नही होता है।
(१४) इससे
हे व्यापक ब्रह्म सदा, यज्ञ में प्रतिष्ठित रहता है।
इस विश्व यज्ञ के कार्यो
से, परमात्मा प्रसन्न रहता है।
(१५) जो नर इस वय में चले हुवे , सृष्टि के कर्म
नही करता है।
वह पापी इन्द्रिय लम्पट
हो, बिन अर्थ ही जीवित रहता है।
(१६) जो नर आत्मा में रति वाला, अरु तृप्त आत्म
सुख में रहता।
निज आत्मा में संतुष्ट रहे, उसको कर्तव्य नही रहता।
(१७) कार्य किये नही किये से भी, उसको हानी अरु
लाभ नही।
संपूर्ण प्राणियों से उसका, कुछ स्वारथ का संबंध
नही।
(१८) इसलिये निरन्तर कार्य कर्म, तुम तज आसक्ति
किया करो।
जो जन एसा करते वे ही, पाते है मोक्ष यह ध्यान
धरो।
(१९) जनकादिक ज्ञानी जन ने भी, कर्मो से परम
सिद्धि पाई।
यदि ध्यान लोकसंग्रह पर दे, तो भी है कर्म उचित
भाई।
(२०) आचण करे वो श्रेष्ठ पुरुष, वह अन्य लोग
भी करते है।
वह जो प्रमाण कर देते है, वैसा सब लोग बरतते है।
(२१) हे भारत तीनों लोको में , मुझको कुछ भी
कर्तव्य नही।
अप्राप्त प्राप्त करना
मुझको, एसी कोई वस्तु रही नही।
दोहा- तो भी मै निज कर्म
को, करता रहता नित्य।
कर्मो मे ही
वर्तता, निर्मल मेरा चित्त ।
(२२) यदि सावधान होकर
जग में, कर्मो को नही करुँगा मैं।
सब लोग चलेगें वैसे ही, जो नही कर्तव्य करुँगा
मैं।
दोहा- यदि कर्म मैं नही
करुं, जग जन होंगे भ्रष्ट ।
संकर कर्ता
होऊगा, प्रजा होवेगी नष्ट ।
(२३) कर्मो मे ही आसक्त
हुवे, अज्ञानी जैसे कर्म करे।
ज्ञानी भी जग
हित कर्म करे, पर फलासक्ति हिय नही धरे।
(२४) विद्वान जनों को
चाहिये की, कर्मो में आसक्ति वाले की।
मुर्ख की मति
में न करे भेद, कर्मो में श्रद्धा वाले की।
पर ब्रह्म रुप
में स्थिर होकर , कर्मो को भली प्रकार करे।
वैसा ही कराये
लोगों से, जैसे शुभ कर्म को आप करे।
(२५) प्रकृति के गुणों
से सर्व कर्म , उत्पन्न ही होते रहते है।
पर अहंकार से
मोहित जन, मै करता हूँ वह कहते है।
२६) मुझ से है ये गुण
कर्म भिन्न, ऐसा हें पूरण ज्ञान जिसे।
वह इनमें नही
आसक्त होय, गुण गुण में वर्तते दिखे उसे।
(२७) प्रकृति के गुणों
से मोहित नर, गुण कर्म में लिप्त रहा करते।
ऐसे मुर्खो
की बुद्धि को , ज्ञानी जन विचलित नही करते।
(२८) तू ध्यान निष्ठ
मन से सब ही, कर्मो को समर्पण मुझ में कर।
आशा ममता संताप
छोड़ , उत्साह सहित अब रण को कर।
(२९) जो पुरुष दोष मति
को तजकर, मम इस मत के अनुसार चले।
वह श्रद्धालु
जन कर्मो के, संपूरण बन्धन से निकले।
(३०) पर जो नर दोष दृष्टि
रखकर, मेरे मत पर नही चलते है।
अज्ञानी मुढ़
उन्हें मानो, वे निज कल्याण न करते है।
(३१) सब प्राणी निज स्वभाव
से ही, परवश हो कर्म को करते है।
ज्ञानी भी अपनी
प्रकृति के , अनुसार चेष्टा करते है।
फिर इसमें किसी
पुरुष का वह , हठ कुछ भी नही कर सकता है।
अपनी अपनी प्रकृति
के वश, सब कारज नर कर सकता है।
(३२)अति इन्द्रियों के
भोगों में स्थिर , जो राग द्वेष दो शत्रु है।
इनके वश में
नही होना वे, कल्याण मार्ग के शत्रु है।
(३३) पर धर्म के शुभाचरण
से भी, गुण रहित स्व धर्म श्रेय कर है।
निज धर्म में मरना उत्तम
है, पर धर्म नरक का ही घर है।
अर्जुन ने कहा-(३४) बिन इच्छा के प्रेरित
ह्प्कर, हठ से पापों को करता है।
हें कृष्ण कौन
उस मानव को, दुष्कृत्य में प्रेरित करता है।
श्री भगवान ने कहा- (३५) काम औ क्रोध यह दोनों
ही, हें रजगुण से उत्पन्न हुवे।
वह पापी विषयों
से न तृप्त, इनको ही जान तू शत्रु हुवे।
(३६) जैसे धुएँ से अनल ढँका, अरु मल से दर्पण
ढँका हुवा।
ज्यों गर्भ ढँका हें झिल्ली से, त्यों ज्ञान काम
से ढँका हुवा।
(३७) कौन्तेय ? काम यह नित्य शत्रु, अग्नि सम
तृप्त न होता है।
इस प्रबल शत्रु से ज्ञानी का, सत् ज्ञान ढँका
ही होता है।
दोहा- (३८) मन बुद्धि
और इन्द्रियाँ, इसके वास स्थान ।
मानव
को मोहित करे, ढँक करके सत् ज्ञान।
(३९) इसलिए
धनंजय प्रथम आप, इन्द्रियों को निज आधीन करो।
जो
ज्ञान विज्ञान को नष्ट करे, उस पापी काम का नाश करो। (४०)
इस देह से सूक्ष्म इन्द्रियाँ है,इन्द्रियों से मन यह परेहि है।
अरु
मन से परे यह बुद्धि है, बुद्धि से आत्मा परेहि है।
(४१) इस प्रकार
ही बुद्धि परे, आत्मा को जान मन वश में कर।
हें महाबाहु इस काम रुप, दुर्जन शत्रु को मार के धर।
भजन
विनय करते नंद नंदन को,
काटने हित भव बंधन को।
कर्मयोग अरु ज्ञान का,
विषय साथ ही साथ।
विधिवत सब समझाईयो, विश्व
गुरु हो नाथ।
करें हम चरण में वन्दन
को, विनय करते…………
दान यज्ञ निष्कर्म के,
तत्व को कहो दयाल।
नर वृत्ति को पाप कर्म
में, खींच कौन ले जाय।
विनासो मम दुख द्वन्द्वन
को, विनय करते……………
कौन कर्म संसार में,
जो निज रुप दिखाय।
अरु कौन से भोग से ,
जीवन व्यर्थ कहाय।
ज्ञान दो हम मति मन्दन को, विनय करते…………..
इस तृतीय अध्याय में,
ये ही प्रश्न प्रधान।
श्रीव्यास की कृपा से,
पीया जगन रस पान।
धन्य हरि दुष्ट निकन्दन
को, विनय करते………..
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