Tuesday, 16 September 2014

श्री मद् भगवद्गीता का हिन्दी पद्यानुवा

श्रीकृष्ण-वचनामृत
                   
                             पहिला अध्याय
राजा धृतराष्ट् ने पुछा-
श्री धर्म भूमि कुरुक्षेत्र बीच, एकत्र रणेच्छुक हुएँ जहाँ
मम सुत और पाण्डु पुत्रों ने , हे संजय कह क्या किया वहाँ
संजय ने कहा;-
उस समय भूप दुर्योधन ने, पाण्डव की सेना लख करके
गुरु द्रोण पास जा वचन कहा, सब रचना व्यूह दिखा करके
(३)राजन् आपका द्रुपद-तनय, उसने यह व्युह बनाया है
       देखिये वृहद सैन्य , पाण्डवों का सजकर आया है
(४)इस युद्ध में भूमि धनंजय से, सज्जित अनेक धनुर्धारी है।
     है सात्यकि और विराट वीर, महारथी द्रुपद बल भारी है।
(५)है धृष्टकेतु और चेकितान , श्री काशीराज पुरजित भी।
       अरु बहु पराक्रमी कुन्ती भोज, पुरुषों में श्रेष्ठ शैव्य भी।
(६)है द्रोपदी के वह पाँचों पुत्र, जो महारथी कहलाते है।
    उत्तभोजा और युधामन्यु , अभिमन्यु बली दिखाते।
(७)है विप्रश्रेष्ठ अब अपने भी , बल वीरों को दिखलाता हुँ।
    जो चुने हुए सेनापति है, उनके भी नाम गिनाता हुँ।
(८)एक तो वीरवर आप प्रभों, श्री भीष्म पितामह कर्ण भी
      संग्राम विजेता कृपाचार्य , रणचतुर वीर विकर्ण भी।
दोहा-सोमदत्त के पुत्र का, भुरिश्रवा है नाम।
        अश्वत्थामा आदि है, धनुर्धारी बलधाम।
(९)और भी बहुत से शुरवीर, नाना विधि धरा चलाते।
रणपटु मेरे हित प्राणों को , देने में नही सकुचाते।
(१०) यह सैन्य हमारा है अजेय, जो भीष्म द्वारा रक्षित है।
        अरु जेयरिपु की सेना है, जो भीमसेन से रक्षित है।
(११) इस कारण मोर्चो पर अपने , सब सावधान हो खड़े रहो।
        अरु निसंदेह पितामह की, रक्षा के हित सब अड़े रहो।
(१२)कोरवों में वृद्ध पितामह भी, दुर्योधन को हर्षाते हुए।
      अरु उच्च स्वर से शंखनाद , गर्जे अरु शंख बजाते हुए।
(१३)फिर शंख नगाड़े पणव ढोल, गोमुखा आदि एक साथ बजे।
        वह शब्द भयंकर हुवा बड़ा, रणहित वीरो ने साज सजे।
(१४)उस क्षण ही माधव ज्ञान सदन, पाण्डव को संग में लिए हुए।
       खड़े थे स्यन्दन श्रेष्ठ बीच , वे अश्व श्वेत भी जुते हुए।
       वह विश्व गुरु कर कमल बीच, अश्वों की बागें लिए हुए।
       कर रहे दिव्य शंखों का नाद, उर विजय मनोरथ किए हुए।
दोहा-पाण्च जन्य ह्रषिकेश , शंख बजा रण माय।
        देव दत्त निज शंख को ,अर्जुन रहे बजाय।
       भीषण कर्मा भीम ने, पौण्डृक शंख बजाय।
    नाद किया रण भूमि में, हर्ष ह्रदय न समाय।
(१६)नृप कुन्ती पुत्र युधिष्ठिर ने, अनन्त विजय कर लिया।
      घनघोर नाद करके उससे, वारियो के हिय को हिला दिया।
      तब शंख सुघोष नकुल ने ले, सब बन्धुन के संग बजा दिया।
     सहदेव ने भी मणि पुष्पक का, अत्यन्त भंयकर नाद किया।
सोरठा- धनुर्धर काशीराज , और शिखण्डी महारथी।
         अरु विराट महाराज , धृष्टधुम्न बलि सात्यकि।
(१८) द्रोपदि सुत अरु द्रुपदराज , हे सुभद्रा नन्दन खड़े हुए।
        महा बाहु शंख बजाय रहे, सब पृथक पृथक भट अड़े हुए।
(१९) उस शब्द भयानक से पृथ्वी, शब्दायमान आकाश हुवा।
        धृतराष्टृ सुतो का ह्रदय वहां` , विदीर्ण उसी नाद से हुवा।
(२०)धृतराष्टृ सुतों को सज्जित लख, कवि केतु पार्थ ने है राजन।
       तब शस्त्र चलाने को क्षण में, कर लिया धनुष वह अरिभंजन।
(२१)दोहा-हे राजन् ह्रषिकेश से, बोले अर्जुन वीर।
              दोनों सेना बीच में,रथ ले चलिए धीर।
(२२)जब तक मै रण में देख न लूँ, युद्ध की कामना वालों को।
  किन किन के साथ लड़ना होगा, हम मोहजनित मतवालों को।
(२३)नृप कौन दुष्ट दुर्योधन का, कल्याण चाहने आए है।
        देखूँगा उन सबको ही, जो रण में योद्धा धाए है।
(२४)संजय ने कहा- राजन् सुनके पार्थ वचन , रण में उत्तम रथ ले जाकर।
                     हरि ने दोनों ही सैन्य बीच , कर लिया खड़ा उसको जाकर।
(२५)अर्जुन से बोले ह्रषिकेश , सम्पूर्ण नृपतियों को देखों।
      अरु भीष्मपितामह द्रोण प्रमुख, समुदाय कोरवों का देखो।
(२६)      दोनों सेना में अर्जुन ने , दादा काका गुरु को देखा।
         मामा भाई बेटे पोते,सुसरे औ मित्र सुह्रद देखा।
(२७)उन खड़े हुए सब बान्धव को,देखा जब रण की भुमि में।
        अर्जुन अति करुणा कर बोला, हो खेदयुक्त रणभुमि में।
(२८)अर्जुन ने कहा-
         कृष्णचन्द्र इन स्वजनों को ,मैं समराड्गण में लखता हूँ।
         है अंग शिथिल मेरा,  अरु खड़ा हुवा मै तकता हुँ।
(२९)मुख मेरा सुखा जाता है,  होता शरीर में कम्प मेरे।
        रोमांचित यह तन होता है, देख के बन्धु जन को मेरे।
(३०)  है चर्म जला जाता मेरा, मन भ्रमित हुवा घबराता है।
           गांडिव हाथों से गिरता है, अब खड़ा रहा नही जाता है।
(३१)है केशव मै लक्षण को भी ,विपरीत यहाँ पर देख रहा।
        रण में अपने कुल का वध कर , कल्याण नही मैं देख रहा।
(३२)  प्रभु विजय नही मैं चाहता हुँ, कामना नही सुख राज की है।
          उस राज भोग से क्या भगवन्, इच्छा न मुझे जीवन की है।
(३३)दोहा-राज भोग सुख चाहिए , जिन स्वजनों के काज।
                वे धन जीवन छोड़ के      , खड़े युद्ध बीच आज।
(३४)         आचार्य वर्ग ताऊ काका, बेटे पोते दादा भी।
                मामा अरु ससुरे साले है, ओ सम्बन्धी बन्धु वर्ग भी।.
(३५)      हे हरि मारने पर भी मुझे, अरु लोक लाज के लिए भी।
            इनको वध करना नही चाहता, फिर क्या केवल हम सभी।
(३६)      धृतराष्टृ के पुत्रो को मार, हमको प्रसन्नता क्या होगी।
            इन आतताईयों के वध से, प्रभु पाप और हत्या होगी।
(३७)     धृतराष्टृ राज के पुत्रों का, या स्वजनों का वध उचित कहाँ।
             माधव स्वजनों का वध करना , मेरे को सुखप्रद नही यहाँ।
(38)    यद्यपि लोभग्रस्त वे है, कुल नाश के दोष न जानते है।
          मित्रों के साथ द्वेष करना, यह पापी पाप न मानते है।
(३९)     हे जनार्दन   कुल के क्षय के , दोषों को जान करके भी हम।
            इस पाप से क्यों नही मुक्त रहे,क्यों नही विचार कर लेवे हम।
(४०)      हे केशव कुल क्षय होने से, कुल धर्म नष्ट होगें सारे।
             धर्म के नष्ट होते ही सब, आ जायेगें कल्मष सारे।
(४१)      हे कृष्ण  पाप अति बढ़ने पर, कुल अबलाएँ दूषित होगी।
             अबला के दूषित होने से, संतान वर्ण संकर होगी।
(४२)      संकर कुल घातक अरु कुल को, वह नरक बीच ले जाते है।
             होने से लुप्त जल किया पिण्ड, पूर्वज नीचे गिर जाते है।
(४३)       इन संकर कारक दोषों से , प्राचीन धर्म नही रहते है।
               करके ये कुल का धर्म नष्ट , जातीय धर्म खो देते है।
(४४)        यह हमने सुना है जनार्दन, जिनका कुल धर्म नष्ट होता।
                फिर नियत काल तक उन जन को, बस नर्कवास करना होगा।
(४५)          राज ओ सुख के लोभ में आ, निज कुल को मारने धाये है।
                 अहो?   यह तो है महान पाप, जिनको करने हम आये है।
दोहा-  रण में निज निज शस्त्र से, मुझे निशस्त्री जान।
           शुभ गति मैं मानू उसे, जो कौरव ले प्राण।
संजय बोला-    अर्जुन यह कह कर वचन , बाण सहित धनु त्याग।
                    बैठ गया जा शोक से, रथ के पिछले भाग।
                   ॥इति प्रथमो अध्याय।।
भजन-  अर्जुन तोहि ज्ञान बताऊँ, निज आतम रुप लखाऊँ।
         मैं पालक हूँ सृष्टि को, तोहि दूँगा दिव्य दृष्टि को।
         पट मोह का वेग हटाऊँ  । …….अर्जुन……..
          तू ध्यान लगा सुन प्यारे, मम वचन तेरे दुख टारे।
         सब संशय शोक नसाऊँ,………..अर्जुन……..
           तू मोह जनित दुख पावे, नैनन के नीर बढ़ावे।
           निन्दा से तुझे बचाऊँ……….अर्जुन…….
            जगन्नाथ दास है मेरा, मम चरन कमल का चेरा।
           उसको भी पास बुलाऊँ……अर्जुन……..

     

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