Tuesday, 23 July 2013

चरम तत्त्व की खोज


उपनिषदों के ऋषियों को सबसे बड़ी अभिलाषा विश्व के तत्त्व पदार्थ को जान लेने की थी। संसार की विभिन्नताओं को एकता के सूत्र में बाँध लेने वाली कौन सी वस्तु है? एसी कोई वस्तु है भी या नही ? यदि है तो उस तक हमारी पहुँच कैसे हो ? हम विश्व तत्त्व को कहाँ खोजे?
विश्व के बाह्य पदार्थों तक हमारी पहुँच सीधी न होकर इन्द्रियों के माध्यम से है। अपनी सत्ता का हम प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते है। इसलिए विश्व तत्त्व की खोज हमे अपने मे ही करनी चाहिए। कुछ काल तक इधर- उधर घुमने के पश्चात उपनिषदों के ऋषि इसी निर्णय पर पहुँचे।अपनी इस यात्रा में वे कभी- कभी वायु, जल, अग्नि, आकाश, असत्, प्राण आदि पर रुके भी, परन्तु उनकी जिज्ञासा उन्हें आत्म- तत्त्व की ओर ले गई।
एक समय की बात है, एक बार इन्द्र और विरोचन दोनों ने प्रजापति के पास जाकर पुछा- आत्मा का स्वरुप क्या है ? इन्द्र देवताओं की ओर से, तथा विरोचन असुरों की ओर से गए।
प्रजापति ने कहा- यह जो आँख से पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है, या जो जल में और दर्पण में दिखाई देता है, वही आत्मा है। प्रजापति ने दोनों को अच्छे- अच्छे कपड़े पहनकर आने को कहा, जब वह सज- धज कर आए, तब प्रजापति ने उन्हें जलभरे मिट्टी के पात्र में झाँकने की आज्ञा दी, और पुछा- कि क्या देखते हो ? दोनों ने उत्तर दिया कि – सुंदर वस्त्र पहने अपने को ।‘
प्रजापति ने कहा- ‘यही आत्मा है।‘ ‘यह ब्रह्म है।‘                                                                                                                                                                                                                                                                              जो जरा –मृत्यु हीन है, जो शोक रहित है, जो सत्य संकल्प है।
विरोचन तो संतुष्ट होकर चला गया। किन्तु इन्द्र को संदेह बना रहा। उसने कहा- भगवन् यह आत्मा तो शरीर के अच्छा होने पर अच्छा लगेगा, परिष्कृत होने पर परिष्कृत  प्रतीत होगा, अंध होने पर अंधा इत्यादि। यह जरा- मरण- शून्य कैसे हो सकती है। ‘ प्रजापते ने दुसरी परिभाषा दी- जो आनन्द सहित स्वप्नों में घुमता है, वह आत्मा है।‘’  इन्द्र को फिर भी संतोष न हुआ। उसने कहा- भगवन् स्वप्न में सुख- दुख दोनों ही होते है, इसलिए स्वप्न देखने वाला आत्मा नही हो सकता। सदा बदलने वाली मानसिक दशाओं को आत्मा मानना संतोष जनक नही है।प्रजापति ने समझाया कि गहरी नींद में जो संपुर्ण सुख में सोता है, और स्वप्न नही देखता, वह आत्मा है। इन्द्र का अब भी समाधान न हुआ।उसने कहा- इसमें मुझे कोई सच्चाई नही दिखती।एसा जान पड़ता है कि सुषुप्ति दशा में आत्मा विनाश को ही प्राप्त हो जाता है।‘’ प्रजापति ने समझाने की चेष्टा की- शरीर की ही मृत्यु होती है, आत्मा की नही। इस अमृतमय अशरीर आत्मा को प्रिय और अप्रिय नही छुते।
                   न जायते म्रियते न विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न न बभूव कश्चित्
                   अजो नित्यः शाश्वतो अयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
अर्थात् – यह न कभी उत्पन्न होता है, न कभी मरता है। यह चैतन्य स्वरुप कभी , कहीं से नही आता । यह अज है, नित्य है, शाश्वत है, प्राचीन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नही मरता।
तत्त्व- पदार्थ का अर्थ ही यह है कि वह अनित्यों में नित्य रुप से अवस्थित हो, और बहुतों में एक हो।   इति।

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