Wednesday, 10 July 2013

धर्म या आडम्बर



            ईश्वर में आस्था रखना, या ईश्वर के प्रति श्रद्धावान होना, प्रात;काल सूर्य को नमस्कार करना, सूर्य को जल चढ़ाना, रोज सुबह मंदिर जाना, प्रार्थना करना , या स्नान के बाद भगवान के समक्ष बैठकर ध्यान लगाना । यह एक एसी क्रिया है, जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनिवार्य है। या संसार में हर व्यक्ति के जीवन की शुरुआत इसी कर्म से होती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने दिन की शुरुआत ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर, सर झुकाकर प्रार्थना करता है- हे ईश्वर मेरा सारा दिन अच्छे कामों मे गुजरे, मुझसे कभी कोई गलत काम न हो ।यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है,जिससे मन निर्मल एवं शान्त रहता है।
          किन्तु धर्म की परिभाषा हर व्यक्ति के जीवन में अलग- अलग होती है।एक समय की बात है, मै सुबह घुमने जा रही थी, वह सोमवती अमावस्या का दिन था। एक महिला थाली में बहुत सारी पुरियाँ और कटोरे में खीर रखकर घर से बाहर निकली। सामने ही गाय खड़ी थी, उसने गाय की पुजा की और वह पुड़ी गाय को खिलाने लगी। तभी भिखारी के छोटे-छोटे तीन बच्चे उसे ललचाई नजरों से देखने लगे। एक जो सबसे छोटा था, एक पुड़ी माँगने लगा।उसने कहा- सिर्फ एक पुड़ी मझे दे दो। किन्तु उस महिला ने उन बच्चों को बुरी तरह दुत्कार कर भगा दिया।और सारी पुड़ियाँ तथा खीर गाय को खिला दी ।मेरी समझ में नही आया, कि गाय को खिलाने का फल उसको मिला या नही ।लेकिन बच्चों की आँखो में जो करुणा दिखाई दी, उसने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया, आज भी मुझे उन बच्चों की आँखो में भुख और लालसा दिखाई देती है, जो मैं शब्दों में बयान नही कर सकती। मुझे आज तक यह समझ में नही आता कि यह धर्म था, या धर्म के नाम पर एक आडम्बर।
          शाम को एक दिन अपनी बेटी के साथ मंदिर गई।बारिश का मौसम चारों तरफ हरियाली । डुबता हुआ सूर्य , छोटी- छोटी गायों के बच्चें अपनी माँ के साथ जंगल से लौट रहें थे । मंदिर का शांत वातावरण , सब कुछ मिलाकर मन को बहुत अच्छा लग रहा था। एक अलौकिक शांति का अनुभव हो रहा था। हम काफी समय तक वहाँ बैठ कर वातावरण का आनन्द ले रहे थे। तभी एक महिला अपने पति के साथ वहाँ आई। उसके पास लौटा था, वह उसमे जल भरकर पीपल के वृक्ष पर चढ़ाने लगी। उसको देखकर अचानक मन में ख्याल आया  कि मै भी थोड़ा सा जल पीपल पर चढ़ाऊ। मैं तुरन्त उठकर उसके पास गई, तथा लौटा माँगा, मैं खड़ी- खड़ी देखती रही, उसने सारा जल चढ़ा दिया, और मुझे देने से मना कर दिया। शायद मुझे देने से उसका फल कम हो जाता । मेरे शान्त मन मे हलचल पैदा हो गई । मैं सोचने लगी – यह कौनसा धर्म या पुजा है, यदि आपका मन साफ न हो, मन मे किसी प्रकार की कटुता हो, तो सारी पुजा व्यर्थ है, यदि निर्मल और पवित्र मन से सिर्फ हाथ जोड़कर ईश्वर को नमस्कार कर लिया तो भगवान प्रसन्न हो जायेगे, उन्हें किसी ओर वस्तु की आवश्यकता नही है। 

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