श्री
भगवान ने कहा-
(१)मैं
और कहुँ ज्ञानों में भी, अति उत्तम परम ज्ञान तुझ से।
सब मुनि जन जिसे जान करके, पा गये परम सिद्धि
जग से।
(२)इस
ज्ञान का आश्रय लेकर जो, मेरे स्वरुप को पाते है।
वह सृष्टि काल में जन्म न ले, अरु प्रलय में
नही दुख पाते है।
(३)मम
महत ब्रह्म रुपी प्रकृति, सब भुतों की योनि जानो।
उस योनि में चेतन बीज रुप, में स्थापन करता हुँ
मानो।
उस जड़ चेतन संयोग ही से, भुतों की उत्पत्ति होती।
अर्जुन यह नियम है सृष्टि का, उत्पत्ति विश्व की
जो होती।
(४)नाना प्रकार
की योनियों में, उत्पन्न ही जो सब जन होते।
हे महद ब्रह्म उद्भव कारण, हम पिता प्रधान बीज
बोते।
(५)हे अर्जुन यह सब रज तम गुण, उत्पन्न ही प्रकृति
से होकर।
यह जीवात्मा अविनाशी को, बाँधे तन में बन्धन
होकर।
(६)उनमें प्रकाश करने वाला, निर्मल यह सतगुण होने
से।
बाँधता हे सुख की इच्छा से, अरु मान ज्ञान का
होने से।
(७)दोहा-
सब रुप जो रजो गुण, तृष्णा संग प्रधान।
कर्म संग से जीव को, वह बाँधे यह ज्ञान।
(८)इस
देही को मोहित करता, तम से अज्ञान प्रगट होकर।
अन्तस्य प्रमाद निद्रा द्वारा, जीव को कसे बन्धन
होकर।
(९)सतगुण
सुख बीज लगाता है, अरु रजगुण कर्म कराता है।
तमगुण ज्ञान को ढँक करके, प्रमाद भी वही कराता
है।
(१०) तमोगुण और रजोगुण को, दाब के सत्वगुण बढ़ता है।
ये रजगुण और सत्व गुण को, दाब के तमोगुण
बढ़ता है।
दोहा- वैसे ही तमगुण तथा ,सतगुण को ही दबाय।
बढ़ता हे अति रजोगुण, सुन अर्जुन चित्तलाय।
(११)जब
चेतना और योग शक्ति, जिस समय सर्व तन में होगी।
उस काल में ऐसा जानो कि, सतगुण की वृद्धि प्रगट
होगी।
(१२)रजगुण
के बढ़ने पर अर्जुन, यह प्रवृति लोभ में होती है।
आरम्भ कर्म का और विषय , उत्पन्न अशान्ति
होती है।
(१३)तमगुण
के बढ़ने पर भारत, अप्रकाश ह्रदय में होता है।
कर्तव्य विमुढ़ हो जाता है, अरु मोह प्रमाद
भी होता है।
(१४) जब सतगुण की वृद्धि में जीव, मृत्यु को प्राप्त
हो जाता है।
तब दिव्य कर्म करने वाला, स्वर्गादि लोक
को पाता है।
(१५)रजगुण
की जब वृद्धि के समय, जिस प्राणी का लय हें होता।
फिर उसका जन्म कर्म ही की, आसक्ति वालो में
होता है।
अरु ह्रदय तमोगुण बढ़ने पर, जिस जन का मरना
होता है।
वह कीटादि पशु योनियों में, उत्पन्न जगत में
होता है।
(१६)सात्विक
कर्म का निर्मल फल, सुख ज्ञान वैराग्य कहा जाता।
अरु राजस कर्म का दुख फल है, तम फल अज्ञान
कहा जाता।
(१७)सत्व
से ज्ञान उत्पन्न होता, अरु लोभ रजोगुण में होता।
अरु मोह प्रमाद तमोगुण से, अज्ञान संग उत्पन्न
होता।
(१८)नर
जो स्थित हें सत्व गुण में, स्वर्गादि लोक में है जातें।
और रजगुण में राजस स्थित, वे पुरुष मनुष्य
लोक पाते।
दोहा-
जो तमगुण में स्थित हुवा, तामसी नर कहलाय।
पा कीटादिक योनि को, अधोगति में जाय।
(१९)जब
दृष्टा त्रय गुण को सिवाय, लखता न अन्य को करता है।
आत्मा को गुण से परे मान, वह मेरी प्राप्ति
करता है।
(२०)दोहा-
जो जन स्थुल शरीर के, उद्भव कारण रुप।
तीनो गुण को जीत ले, जो सत् रज तम
रुप।
(२१)वह
जन्म मृत्यु अरु जरा के भी, दुखों से मुक्त हो जाता है।
छुट के जगत के बंधन से, वह परमानंद को पाता
है।
(२२)अर्जुन
ने कहा-
अतीत हुवा तीनों गुण से, किन लक्षण वाला होता
है।
अरु किस प्रकार का वह मनुष्य , आचरणों वाला
होता है।
दोहा-
तीनों गुण से वह पुरुष, कैसे होय अतीत।
प्रभु कहिये समझाकर, जो है इसकी रीत।
(२३)श्री
भगवान ने कहा-
जो मोह प्रकाश प्रवृत्ति को, पा करके दुख नही
पाता है।
अरु निवृत्त होने पर अर्जुन, न ही इच्छा उनकी
करता है।
(२४)जो
उदासीन सम हो स्थित है, न गुणों से वह विचलित होता।
वह गुण ही गुण में वर्तते है, ऐसा जो समझवान
होता।
वोही मनुष्य परमात्मा में, स्थिर एकी भाव से
होता है।
उस स्थिति से फिर चलायमान, वह पुरुष कभी नही
होता है।
(२५)जो
धीर भट्टी पत्थर सोना, दुख सुख में सम स्वस्थ जाने।
वह निन्दा स्तुति प्रिय अप्रिय में, सम भाव
से रह शान्ति माने।
(२६)सम
पक्ष मित्र अरु बैरी का, सम मान और अपमान जिसे।
वह गुणातीत कहलाता है, नही कर्तापन का मान
जिसे।
(२७)
हो भक्ति योग से एक निष्ठ , जो मुझे निरन्तर भजता है।
वह तीनों गुणों से हो अतीत, परब्रह्म की प्राप्ति
करता है।
दोहा-
अविनाशी परब्रह्म का, अमृत अरु निज धर्म ।
सुख अखण्ड का स्थान हूँ, मै ही आश्रय मर्म।इति
श्री।
भजन
हे
योगेश्वर श्री कृष्ण प्रभु, मुझ दीन को शरण बुला लेना।
जग
ताप में आज लौ बहुत जला, संताप की अग्नि बुझा देना।
मुझे
क्लेश कलंकी ने घेर लिया, अरु क्रोध ने डेरा जमाय लिया।
इन
बैरी को घर से निकाल मेरे, आनंद की लहर बहा देना।
मै
दीन दुखी इस बात से हूँ, अज्ञानी मोह के साथ में हुँ ।
हिय
ज्ञान का दीप लगा करके, अज्ञान का तिमिर मिटा देना।
प्रिय
पुज्य गुरु सब विश्व के हो, अति प्यारे सखा निज भक्त के हो।
भव
वारीधि पार उतार मुझे, हरि चरण का भ्रमर बना देना।
कवि
जगन तो द्वार पे आन खड़ा, पद पंकज शीश नमाय पड़ा।
हम दीन
कुटुंब को पाल प्रभो, निज रुप में रुप मिला देना।इति श्री
No comments:
Post a Comment