श्री
भगवान ने कहा-
(१)हे
कुन्ती पुत्र इस काया को, पण्डित जन क्षेत्र ही कहते है।
अरु इसे जानने वाले को, क्षेत्रज्ञ ज्ञानी जन
कहते है।
(२)हे
पार्थ सर्व ही क्षेत्रों में, क्षेत्रज्ञ जीव मुझको जानो।
क्षेत्रज्ञ क्षेत्र को जानता है, वह ज्ञान हें
यह मम मत मानों ।
(३)यह
क्षेत्र जो है अरु जैसा है, तथा जिन विकारों वाला है।
संक्षेप में सुन जिससे क्षेत्रज्ञ , हुवा जिस
प्रभाव वाला है।
(४)ऋषियों
के द्वारा बहु प्रकार, यह प्रथक प्रथक भी कहा गया।
वेद मन्त्र निश्चित युक्ति युक्त, अरु ब्रह्म
सुत्र में कहा गया।
(५)हंकार
बुद्धि अरु महा भुत, यह और त्रिगुणमयी माया भी।
शब्दादि विषय सब इन्द्रियों के, मन एक और दश इन्द्रियाँ
भी।
(६)तन
स्थुल पिण्ड सुख दुख द्वेष, इच्छा अरु चेतना श्रुति जो।
संक्षेप में कहा विकारों युत, हे कुन्ती पुत्र क्षेत्र
जो है।
(७)निर
अभिमान ओ दम्भ रहित, क्षमा भाव और अहिंसा भी।
श्रद्धा भक्ति युत गुरु सेवा, अरु मन वाणी की
सरलता भी।
बाहर अरु भीतर की शुद्धि , अरु निज मानस की स्थिरता
भी।
मन और
इन्द्रियों के भी सहित, निग्रह अपने शरीर काभी।
(८)वैराग्य
भी हो सब भोगों में ,अरु अहंकार का अभाव हो।
जन्म मृत्यु अरु जरा व्याधि में, दुख दोषों का
भी विचार हो।
(९)आसक्ति
ममता का अभाव, हो स्त्री पुत्र घर धनादि में।
अरु सदा ही चित्त का सम रहना, अप्रिय अरु प्रिय
की प्राप्ति में।
(१०)अरु
अनन्य योग से मेरे में, व्यभिचार रहित भक्ति भी हो।
विषयी पुरुषों में प्रेम न हो, एकान्त बीच
रहता भी हो।
(११)अध्यात्म
और सर्वत्र ईश, दर्शन यह ज्ञान कहाता है।
इससे विपरित है जो अर्जुन, वह सब अज्ञान कहाता
है।
(१२)जानने
योग्य कहता हुँ बात, जिहि जान परम आनंद पाता।
वह आदि रहित है परम ब्रह्म, न ही सत् असत्
कहा जाता।
(१३)सब
ओर से हाथ पैर वाला, सब ओर नैत्र सिर मुख वाला।
जग में सबको आहत करके, स्थिर है सब ओर श्रोत वाला।
(१४)कर
व्याप्त विश्व में सबको वह, गुण इन्द्रियों के जानन वाला।
आसक्ति रहित निर्गुण पालक अरु गुण भोगन वाला।
(१५)सब
भुतों में बाहर भीतर, जो चिर अरु अचर रुप ही है।
अज्ञेय हे सुक्ष्म होने से, हे दुर में भी
अरु निकट भी है।
(१६)हे
विभाग रहित वह एक रुप, आकाश के सम परिपुर्ण हुवा।
पर पृथक पृथक सम भुतों में, होता प्रतीत वही
स्थित हुवा।
जानने योग्य विष्णु के रुप, सब भुतों का पोषण
हुवा।
वही रुद्र रुप से कर संहार, ब्रह्मा होकर उत्पन्न
करता।
(१७)योगियों
का भी वह ज्योति हे, माया से परे कहा जाता।
बोध स्वरुप जानने योग्य , वह तत्व ज्ञान से
ही पाता।
(१८)सोरठा-क्षेत्र
ज्ञेय अरु ज्ञान, इहि विधि कहा संक्षेप में।
तत्व भक्त मम जान, प्राप्त होय मम
रुप को।
(१९)हे
अर्जुन प्रकृति और पुरुष, दोनो ही अनादि यह जानो।
रागादि विकारो और गुणों , को भी प्रकृति से
प्रगट जानो।
(२०)कार्य
व कारण यह दोनों ही, उत्पन्न प्रकृति से होते है।
भोक्ता यह जीव आत्मा है, जो जग में दुख सुख होते
है।
(२१)प्रकृति
मे ही स्थिर हुवा पुरुष, प्रकृति के गुणों को भोगता है।
सत् असत् योनियों बीच जन्म, कारण गुण सड़्गी
होता है।
(२२)इस
तन में स्थित हुवा पुरुष, वह सबसे परे कहाता है।
अरु केवल साक्षी होने से, उपदृष्टा वह कहलाता
है।
अनुमोदन करता होने से, अनुमन्ता भी वह कहलाता।
वही जीव रुप से हे भोक्ता, धारण से भरता कहलाता।
(२३)सब
विश्व का स्वामी होने से, वह महिश्वर भी कहलाता है।
सच्चिदानन्द घन होने से, परमात्मा वही कहाता
है।
(२४)गुण
सहित प्रकृति पुरुष का जो, बुध मान्व इस विधि ज्ञाता है।
वह जैसा ही बर्ताव करे, फिर नही जन्म को पाता
है।
(२५)कोई
सुक्ष्म गति से आत्मा को, अपने में ध्यान द्वारा देखे।
कोई ज्ञान योग से अरु कोई, निष्काम कर्म द्वारा
देखे।
(२६)पर
मंद बुद्धि ऐसा न जान, औरों से सुन सेवन करते।
सुनकर उसमें रत रहने से, वे नि;संशय भव से
तरते।
(२७)अर्जुन
कुछ भी स्थावर जंगम, वस्तु जो उत्पन्न होती है।
तू जान उसे क्षेत्रज्ञ और, क्षेत्र के संग से होती
है।
(२८)जो
नाश हुवे चर अचर बीच, अविनाशी इसको समता से।
स्थिर देखता है वही देखता है, वह पुरुष दुर
हो ममता से।
(२९)सबमें
स्थिर सम ईश को सम , देखता हुवा अपने द्वारा।
इससे गति उत्तम पाता है, न करे निज घात वह
निज द्वारा।
(३०)
जो जन संपुरण कर्मो को, प्रकृति से ही किये देखता है।
आत्मा को अकर्ता लखता है, वह पुरुष यथार्थ
लखता है।
(३१)
भुतों के भाव को भिन्न भिन्न ,इक ईश में स्थिर लखता है।
विस्तार उसी से लख करके, तब ब्रह्म की प्राप्ति
करता है।
(३२)वह
घनादि निर्गुण होने से, माया से रहता लिप्त नही।
स्थिर हुवा भी तन में अविनाशी, परमात्मा करता
कर्म नही।
(३३)सुक्ष्म
होने से व्यापक नभ, वह लिप्त कभी नही होता है।
वैसे सब तनु में स्थिर आत्मा, तनु गुण से लिप्त
न होता है।
(३४)भारत
जैसे एक ही सूर्य , सब विश्व प्रकाशित करता है।
उस प्रकार एक आत्मा भी, सब देह प्रकाशित करता
है।
(३५)दोहा-
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का , भेद कहा समुझाय।
छुट जाने को प्रकृति से, मैने कहा उपाय।
ज्ञान नेत्र अरु तत्व से, जो जन लेवे जान।
करे प्राप्ति वह ब्रह्म की, यह हे सत्य प्रमाण।
भजन
श्री
कृष्ण चन्द्र का ज्ञान हिये धरते है,
वह बिन श्रम ही नर भवसागर तरते है।
जो
भक्त प्रेम में मग्न रहा करते है,
वह हरि चरणों के भ्रमर बना करते है।
जो
नर संकट में नीति नही तजते है,
उन पुरुषों के ही नाम रटा करते है।
जो
वीर धर्म हित प्राण दिया करते है,
वे सुरपुर के सुख प्राप्त किया करते
है।
जो
अपने सम औरों का दुख लखते है,
वह जन आत्मा के ज्ञान बीच रमते है।
जो
नर तन पाकर पर हित को करते है,
जगन्नाथ उसी के शीश धरते है।इति श्री
ते०अ०।
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