Friday, 27 February 2015

बारहवाँ अध्याय

   
(१)अर्जुन ने कहा-
इस भाँति निरन्तर लगे हुवे, जो भक्त सगुण तुमको भजते।
अरु जो अक्षर अविनाशी भजे, इनमें उत्तम किसको कहते।
(२) श्री भगवान ने कहा-
कर निश्चल मन मेरे में नित, मुझ सगुण को जो नर भजते है।
वे उत्तम योगी मान्य मुझे,जो अति श्रद्धा से भजते है।
(३)जो रहता मन बुद्धि से परे, अरु अकथनीय अविनाशी है।
रह सदा एक रस नित्य अचल, जो निराकार अरु व्यापी है।
जो इन्द्रियों को वश में करके, नित ब्रह्म में ध्यान लगाते है।
सब में सम भाव मित्र सब के, वे योगी मुझको पाते है।
(५)उन निराकार आसक्त चित्त, योगिन को क्लेश अधिकतर है।
    क्योंकि तन धारी पुरुषों को, गति अव्यक्त पाना दुष्कर है।
(६)जो मेरे परायण भक्त हुवे, सब कर्म मेरे अर्पण करके।
    मुझ सगुण को नित चिन्तन करते,भजते है अनन्य योग करके।
(७)मुझमें जो चित्त लगाते है, हे अर्जुन  मै उन भक्तों का।
    झट मृत्यु रुप भव सागर से, उद्धार मै करता भक्तों का।
(८)दोहा- मन बुद्धि मुझमें लगा, इसके तु उपरान्त।
             मेरे मे ही बसेगा , संशय नही नितान्त।
(९)यदि नही है समर्थ मन को तु, मुझ में स्थिर करने के लिये।
         अभ्यास योग से कर इच्छा, हे पार्थ मुझे पाने के लिये।
     (१०)कर सकता नही अभ्यास यदि, केवल मम हित कर कर्मो को।
             सिद्धी को प्राप्त होगा मेरी, मेरे हित करता कर्मो को।
     (११)दोहा-यदि समर्थ इसमें नही, अति बुद्धि मन राम।
              शरण हुवा मम योग को, सर्व कर्म फल त्याग।
(१२)क्योंकि अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ, अरु ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ ही है।
       ध्यान से कर्म फल त्याग श्रेष्ठ, अति शान्ति त्याग से मिलती है।
(१३)जो द्वेष रहित भुतों का मित्र, ममता से रहित करुणा वाला।
       सम भाव हे दुख सुख में जिसका, ईश्वर से रहित क्षमा वाला।
(१४)हानी ओ लाभ संतुष्ट वशी,जो योगी दृढ़ निश्चय वाला।
       वह मेरा भक्त मेरा प्यारा, अर्पित मुझमें मन मति वाला।
(१५)जिससे उद्वेग न हो जन को, न क्लेश किसी से उसे होगा।
       भय हर्ष विषाद को क्लेश रहित, वह भक्त मुझे प्यारा होगा।
(१६)जो चतुर है इच्छा रहित भी है, बाहर भीतर से शुद्ध भी है।
       जो छुटा हुवा हे दुखों से, अरु पक्षपात से रहित भी है।
दोहा- कर्तापन अभिमान का, किया है जिसने त्याग।
         उसी भक्त पर हए मेरा , सब प्रकार अनुराग।
(१७)जो पुरुष हर्ष नही द्वेष को, नही सोच कामना करता है।
      कर्मो का शुभा शुभ फल त्यागे, वह भक्त मुझे प्रिय लगता है।
(१८)शत्रु मित्र अपमान मान में, जो जन समता से रहता है।
       सर्दी गर्मी दुख सुख में सम, आसक्ति रहित जो रहता है।
(१९)जो निन्दा स्तुति सम माने, अरु मनन शील भी रहता है।
        जो मिले उसी मे काया का, संतोष से पोषण करता है।
        जो वास स्थान मे मोह रहित, और हे स्थिर बुद्धि वाला।
        वह पुरुष मुझे प्रिय लगता है, जो श्रद्धा और भक्तिवाला।
दोहा- कहा हुवा जो धर्म मय, अमृत वचन रसाल।
         श्रद्धा युत मुझमे लगे, सेवत होत निहाल।
         मेरे को वह भक्त जन, अतिशय प्यारे होय।
          मम निश्चल मन से भजे, दुख द्वन्द को खोय।इति श्री।
                                  भजन
जिन कृष्ण का नाम उच्चारा, वही नर पावत मोक्ष द्वारा।
प्रेम भक्ति के मारग चलकर, जिन जन जन्म सुधारा।
वह बढ़भागी हे इस जग में, जिन आतम ज्ञान बिचारा।
पट के भीतर अलख निरन्जन, शोधो बारम्बारा।
जान पना वह त्यागत नाही, साक्षी स्वरुप तुम्हारा।
संत सभा वह ज्ञानी जन ने, वेदो से तत्व निकाला।
तुही ब्रह्म अलख अविनाशी, तेरा ही विश्व पसारा।
जगन्नाथ ने हरि गीता पढ़, जन्म मरण भय टारा।

तुम भी श्रोता गण उर धर धारो, विश्व में रुप हमारा।इति श्री।

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