अर्जुन
ने कहा-
(१)मेरे
पे कृपा करने के हित, यह अति सुयोग्य अध्यात्म कहा।
इस सत् उपदेश आपके से, अज्ञान मुझे अब नही रहा।
(२)हे
कमल नयन मैनें तुमसे, भुतों का जन्म अरु कारण सुना।
विस्तार पूर्वक अविनाशी, है सब प्रभाव आपका सुना।
(३)अपने
को आप कहने जैसा, यह ऐसा ही है परमेश्वर।
ऐश्वर्य युक्त आपका रुप, मै लखना चाहता विश्वेश्वर।
(४)मेरे
द्वारा आपका रुप, देखा जाना यदि शक्य प्रभो।
योगेश मानते हो ऐसा, तो लखाओ अव्यय रुप प्रभो।
श्री
भगवान ने कहा-
(५)मेरे
सेकड़ो हजारो ही, हे पार्थ अनेक वर्ण वाले।
तू देख अलौकिक रुपों को, जो है नाना आकृति वाले।
(६)अश्विनी
कुमार अरु मरुत गणों , आदित्य बल अरु रुद्रों को।
बहु लेखन भारत प्रथम कभी, लख विस्मय वाले रुपों
को।
(७)अब
एक ठौर इस मम तन में,चर अचर सहित सब जग देखो।
दिखा न और भी जो जो है , हे अर्जुन सब कुछ तुम
देखो।
(८)
पर मुझको इन नैत्रों से तुम , नही समर्थ लखने में भारत।
इसलिये दिव्य चक्षु देता, मम योग प्रभाव देख
भारत।
(९)इस
प्रकार कहकर तदनन्तर, योगेश चक्रधारी ने फिर ।
अति परम दिव्य एश्वर्य युक्त, अर्जुन को रुप
दिखाया फिर।
(१०)हे
अनेक मुख नैत्रों से युक्त , जो बहु अद्भुत दरशन वाले।
अरु
बहुत दिव्य आभुषण युक्त, कर दिव्य शस्त्र धारण वाले।
(११)अति
दिव्य माल वस्त्रों से युक्त, अलौकिक गंध लगाये हुवे।
सीमा से रहित आश्चर्य युक्त, वे दिव्य रुप
को लिये हुवे।
(१२)भानु
की प्रभा नभ से सहस , इक साथ उदय जो हो जावे।
तो ही उस विश्व रुप प्रभु के, सादृश्य कदाचित्
ही पावे।
(१३)उस
समय पाण्डु पुत्र अर्जुन ने ,देवादिदैव के उस तन में।
सब विश्व को एक ठोर देखा, स्थिर पृथक पृथक बहु
भागन में।
(१४)तब
पुलकित रोम युक्त अर्जुन, अतिशय विस्मय संपन्न हुवा।
शिर से प्रणाम करके हरि को, कर जोड़ के वो बोलता
हुवा।
(१५)अर्जुन
ने कहा-
हे देव आपके इस तनु में, संपुरण देवों को देखा।
नाना प्रकार के भूतों के, सब समुदायों को भी
देखा।
अरु कमलासन पर बैठे हुवे, मै ब्रह्मा को भी लखता
हुँ।
शंकर अरु ऋषियों का समुह, अरु दिव्य सर्प बहु
लखता हुँ।
(१६)बहु
हाथ पेट मुख नैत्र युक्त, सब और अनन्त रुप वाला।
लखता हुँ आपका विश्व रुप, नही अन्त मध्य आदि
वाला।
(१७)हे
विष्णु आपको मुकुट युक्त, अरु गदा चक्र युत लखता हुँ।
प्रकाश मान तेज का पुंज, प्रज्वलित अग्नि सम
लखता हुँ।
दिनकर के सम ज्योति वाला, लखने में गहन देखता
हुँ।
अग्नमेय रुप आपका यह, सब ओर अगम्य देखता हुँ।
(१८)इस
विश्व के आप परम आश्रय, जानने योग्य परमाक्षर है।
मम मत से आदि अव्यय पुरुष, अरु आदि धर्म के
रक्षक है।
(१९)हो
आदि मध्य अरु अन्तर हित, यह अनन्त बाहु शक्ति वाला।
शशि सूर्य रुप नैत्रों वाला, अति ज्वलित अनल
आनन वाला।
दोहा-
अपने तेज प्रभाव से, इस जग को विश्वेश।
संतापित करते हुवे, लखता तुम्हें अशेष।
(२०)हे
योगेश्वर यह स्वर्ग और, पृथ्वी के बीच का संपूरण।
आकाश और सब दिशाएँ भी, एक आप से ही है परिपुरण।
यह आपका उग्र रुप अद्भुत, लख कर निज धीरज खोते
है।
हे कृष्ण महात्मन तीनों लोक, अति व्यथित ह्रदय
में होते है।
(२१)वे
सर्व देवताओं के झुंड , आपकी शरण में आते है।
कोई भयभीत हाथ जोड़े, हरि नामोच्चारण करते
है।
मुनि सिद्ध और ऋषि के समुह, सब स्वस्ति स्वस्ति
ऐसा कहकर।
उत्तम उत्तम स्त्रोतों द्वारा, स्तुति करते
नव गुण गण गाकर।
(२२)आदित्य
साध्य गण रुद्र गण , विश्वे देवा अरु पितृ समुह।
यश्च
मरुत गण अश्विनी कुमार, राक्षस और गन्धर्व समुह।
सोरठा-
सिद्धो के समुदाय, आपकी ओर निहार के।
विस्मित हे उर माय, हे परमेश्वर जगत्
जन।
(२३)हे
महाबाहो आपके यह , मुख है अनेक नैत्रो वाले।
हे बहु जंघा अरु हाथ पैर, बहु उदरों बहु दाढ़ो
वाले।
दोहा-
देख महा इस रुप को, व्याकुल है संसार।
मै भी व्याकुल हो रहा, लख के रुप अपार।
(२४)हे
विष्णो नभ के साथ साथ , स्पर्श किये देदीप्यमान।
होकर के बहु रुपो से युक्त, अरु मुख फैलाये
हुवे महान।
दृष्टि विशाल नैनों से युक्त, आपको देख भयभीत
हुवे।
धीरज नही धरता मम मानस, और शान्ति को नही प्राप्त
हुवा।
(२५)प्रज्वलित
मुखों दाढ़ो वाले, जो प्रलय काल की अग्नि सम।
यह रुप आपका देख प्रभो, हो गया मुझे चारों दिश
भ्रम।
दोहा-
सुख को मै नही प्राप्त हूँ, इससे हे देवेश ।
हो प्रसन्न मुझ पर प्रभु, मेटो मेरा क्लेश
।
(२६)
सब भुप सहित धृतराष्ट्र पुत्र, अरु भीष्म द्रोण कर्ण सारे।
मम अरु पक्ष के प्रधान सहित, तुममें प्रवेश
करते सारे।
(२७)प्रभु
कठिन दाढ़ भीषण मुख में, वे प्रवेश वेग युत करते है।
दांतों के बीच में दबे हुवे, शिर पीसे हुवे
कुछ दिखते है।
(२८)ज्यों
बहु जल प्रवाह नदियों के, वारिधी के सन्मुख जाते है।
वैसे नर वीर सभी तुमारे, प्रज्वलित मुखों में
आते है।
(२९)प्रदीप्त
अनल में वेगयुक्त, जै पतंग मरने के लिये।
करते प्रवेश सब मुखों बीच, सब लोक नष्ट होने
के लिये।
(३०)प्रज्वलित
मुखों से सभी लोक, खाते हो तथा चाटते हो।
संसार सभी परिपुरित कर, निज तेज से आप तपाते
हो।
(३१)
हे उग्र रुप प्रभु आप कौन , हे देव श्रेष्ठ कहिये मुझसे।
हे नमस्कार मेरा तुमको, हे नाथ प्रसन्न रहो
मुझसे।
(३२)
श्री भगवान ने कहा-
जीवों का नाश करने वाला, अत्यन्त विशाल काल
हूँ मै।
जीवों को नष्ट करने के हित, इस समय प्रवृत्त
हुवा हूँ मै।
दोहा-प्रति
पक्षिन की सैन्य में, जो स्थित हें रणधीर।
तव बिन भी हे सकल नर, जीवित रहे न वीर ।
(३३)इसलिये
खड़े होकर अर्जुन, रिपुओं को जीत यश प्राप्त करो।
अरु धन धान्य समेत इसी, संपन्न राज का भोग
करो।
हे वीर सव्यसाचिन अर्जुन , यह सुभट सर्व मेरे
द्वारा।
हे प्रथम मे ही वध किये हुवे, हो निमित्त
मात्र यश ले सारा।
(३४)जयद्रथ
कर्ण अरु भीष्म द्रोण, अरु अन्य सभी योद्धाओं को।
मैने पहले ही मार दिया, इन शुरवीर रणधीरों
को ।
दोहा-
रण करके अब मार तु, भय मत खाये वीर।
जीतेगा तू युद्ध में, निश्चय रख मति धीर।
(३५)संजय
ने कहा-
सुन पार्थ वचन केशव के यह, कंपित कर जोड़ नमन
करके।
गद् गद् हो बोला कृष्ण प्रति, फिर भी भयभीत
बदन करके।
(३६)हे
ऋषिकेश यह योग्य ही हे, आपके नाम अरु कीर्तन से।
यह जग अति हर्षित होता है, अनुराग भी होता चिन्तन
से।
भयभीत
हुवे हे राक्षस गण, सब चारों ओर ही भागते है।
अरु
सिंह गणों के सब समुह , वे नमन आपको करते है।
(३७)हो
ब्रह्मा के भी आदि करता, अरु सबसे बड़े आप ही हो।
फिर नमस्कार कैसे न करे, हे हरि अनन्त देवेश
ही हो।
हे जग निवास सत् असत् जोड़े, उनसे भी परे आप
ही हे।
हो अक्षर ब्रह्म सर्वेश प्रभो, श्री कृष्ण
ज्ञान घन आप ही है।
(३८)हो
पुरुष सनातन आदि दैव , जग को आश्रय देने वाले।
हो आप ही परम धाम भगवन्, जानने योग्य आनन वाले।
दोहा-
अनन्त रुप प्रभु आपसे, परिपुरण संसार।
इस स्वरुप को जानकर, भ्क्त होय भव पार।
(३९)दोहा-
वायु अग्नि यम वरुण शशि, प्रजापति करतार।
प्रपिता मह प्रभु आपको, नमन हजारों
बार।
(४०)हे
अनन्त सामर्थ्य युक्त, पीछे आगे मम नमस्कार।
हे आपके हेतु सर्व आत्मन् , सब ओर से मेरा
नमस्कार।
हो तुम अनन्त शक्तिशाली, अरु व्याप्त दिश को
किये हुवे।
हो इससे आप ही सर्व रुप, इस समय भी नर तन लिये
हुवे।
(४१)प्रिय
मित्र आपको मान सदा, वह प्रभाव नही जानता हुवा।
प्रमोद से हट से प्रेम से भी, हे यादव कृष्ण
मै कहता हुवा।
(४२)हे
अच्युत सोते बैठते वो, भोजन में हंसी भी करता था।
एकान्त अरु उन सखाओं में, अपमानित आपको करता
था।
दोहा-
अचिन्त रुप प्रभु आपसे, क्षमा कराता नाथ।
प्राणी हूँ मै सर्वथा, प्रेम भक्ति के साथ।
(४३)
हो पिता गुरु से अधिक आप, गुरु पुजनीय सब जग के हो।
हो अतिशय प्रभाव वाले हरि, अरु स्वामी चराचर
जग के हो।
आपके समान लोकत्रय में, दुसरा नही कोई भगवन्।
तो फिर होवेगें अधिक कहाँ, यह निश्चय हें मुझको
भगवन्।
(४४)इससे
शरीर धर चरणों में , कर नमन प्रसन्न मै करता हुँ।
हो स्तुति करने के योग्य आप, मै कृपा की इच्छा
करता हुँ।
हे देव पिता सुत पर जैसे, अरु मित्र के जैसे
मित्र करे।
जैसे पत्नि के पति करे, वैसे सब दोष को क्षमा
करे।
(४५)जो
प्रथम कभी नही देखा था, वह रुप को आज मै देख रहा।
इस रुप को देख के हर्षित हुँ, पर मन तो व्याकुल
होय रहा।
हे देव आप होकर प्रसन्न, उस अपने रुप चतुर्भुज
को।
हे जग निवास देवेश प्रभो, दिखलाओ सोम्य रुप
मुझको।
(४६)
वैसे ही आपको मुकुट युक्त , अरु गदा चक्र कर लिये हुवे।
हे विश्व रुप तुम दर्शन दो, प्रिय रुप चतुर्भुज
किये हुवे।
(४७)
श्री भगवान ने कहा-
यह मैने योग भक्ति बल से, तेजोमय रुप दिखाया
है ।
सबका आदि स्वरुप तुझको, होकर प्रसन्न बतलाया
है।
दोहा-
विराट रुप सीमा रहित, तुमने देखा वीर।
अन्य पुरुष ने अब तक, नही देखा मति धीर।
(४८)
कर वेद पाठ तप उग्र किया, यज्ञादि दान से नही देखा।
यह विश्व रुप मेरा अर्जुन , नर लोक में तुमने
ही देखा।
(४९)
मेरा विकराल ये रुप देख, मत मन में अपने घबराओं ।
लख रुप चतुर्भुज प्रेम सहित, भय त्याग मुढ़ता
बिसराओं।
(५०)
सन्जय ने कहा-
प्रभु ने एसा कह अर्जुन को, यह रुप चतुर्भुज
दिखलाया।
फिर सोम्य रुप कृष्ण होकर, भयभीत को धीरज बँधवाया।
(५१)
अर्जुन ने कहा-
नर रुप आपका शान्त देख, भगवन् मम मानस शान्त
हुवा।
विस्मय भी भगा भय दुर हुवा, मै निज स्वभाव
को प्राप्त हुवा।
(५२)श्री
भगवान ने कहा-
हे अर्जुन सोम्य रुप का यह , तुमने जो दर्शन
पाया है।
वह देवों को भी दुर्लभ है, तुमको मैने दिखलाया
है।
(५३)जिस
रुप को तुमने देखा है, न ही वेद पाठ से मिलता है।
अरु नही तप दान यज्ञ से भी, यह किसी पुरुष
को मिलता है।
(५४)अनन्य
भक्ति करके अर्जुन, इस रुप चतुर्भुज वाला मै।
प्रत्यक्ष तत्व से जानने को, इक भाव से प्राप्ति
वाला मै।
(५५)अर्जुन
जो परायण हो मुझको, कर्मो को अर्पण करता है।
वह जन आसक्ति रहित होकर , फिर भक्ति मेरी करता
है।
दोहा-
बैर भाव से रहित हो, रखता सब पर प्रेम ।
होता मुझको प्राप्त वह, जिसका है यह नेम।इति
श्री।
भजन
श्री
कृष्ण इतना वर दो, जब प्राण तन से निकले।
सन्मुख
हो आप स्वामी, जब प्राण तन से निकले।
श्री
ब्रह्माजी का तट हो, कु टिया पे बंशी वट हो।
श्री
कृष्ण नाम घट हो, जब प्राण तन से निकले।
मुरली
मधुर बजाओ, प्रभु रास भी रचाओ ।
संग
में सखा बनाओ , जब प्राण तन से निकले।
मुख
में श्री गंगाजल हो, उसमें ही तुलसी दल हो।
मन
सान्त अरु अचल हो, जब प्राण तन से निकले।
चरणों
में शीश धर लुँ, दोनो चरण पकड़ लुँ।
उसमें
निवास कर लुँ, जब प्राण तन से निकले।
तन
पर हो गोपी चन्दन, रसना पे नन्द नन्दन।
कर
लुँ मै तुमको वन्दन, जब प्राण तन से निकले।
ऋषि
जगन कहे पुकारी, आशा यही हमारी।
पुरण
करो मुरारी, जब प्राण तन से निकले।इति।
भजन (२)
हे
कृष्ण मुरली वाले, इतनी कृपा तो करना।
दिन
रैन मेरे मन के, मन्दिर में रमा करना।
तुम
बहुत दिन से मुझसे, बिछुड़े हुवे हो मोहन।
अब
वेग दर्श देकर, लोचन को सफल करना।
हम
ग्वाल बन के तुमरे, संग में रहेगें प्यारे।
तुम
कर में करते मेरा, बृजबन में फिरा करना।
श्री
यमुना जी के तट पे, गोपी व ग्वाल लेकर।
प्रिय
रचके रास मंडल, बंसी की धुनि करना।
यह
भावना जगत की, योगेश पूर्ण करके।
लेकरके
शरण मुझको, मम जन्म मरण तरना।इति श्री ग्या० अ०।
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