जब
तम में जीवन डुब गया था सारा
सोया
था दुर कहीं पर भाग्य सितारा
तब
तुम आश्वासन दे विद्युत सी दमकी
तुम
सहसा आ आलोक शिखा सी चमकी
सुखे तरुवर
पतझर से प्रतिपल लढ़कर
सर्वस्व गवाँ मिटने वाले ये भुपर
तब तुम नव बसंत सी उर में आ धमकी
तुम सहसा आ आलोक शिखा सी चमकी
जब
पीडित अंतर ने आह भरी दुख की
जब
सुख गई थी सारी लहरें सुख की
तब
घन बनकर तुमने नीरसता कम की
तुम
सहसा आ आलोक शिखा सी चमकी।
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