कुर्मांचल का बसन्त
, पुराने पत्तों का झरना , नई कोंपलों का आना। इस परिवर्तनशील प्रकृति के प्राँगन में
एक अलोकिक अनुभूति का आभास होता है। मन मयुर नाच उठता है।पोंधो में नई-नई कोंपलें फुटने
लगती है। सुन्दर – सुन्दर रंग-बिरंगे फूलों को देखकर मन आनन्दित होता है। सूर्य का
उदयकाल , पक्षियों का कलरव ,चिड़ियों का चहचहाना सब मिलाकर एक नया वातावरण पैदा करते
है। ऐसे माहौल में प्रातःकाल बगीचे में भ्रमण करना बहुत लाभकारी होता है।पार्क में
भ्रमण करते हुए अब आप तौता और मैना की बातचीत सुनिए-मैना तौते से कहती है ,यह जीवन
अनमोल है, इसे व्यर्थ मत गवाओं ,हरि का नाम भजो। तौता कहता है, मैना तुम मुझे उपदेश मत दो- जीवन का सुख
भोगने दो।
मैना-रे मन तौता हरि- हरि बोल
अरे
तेरी इक इक श्वास अमोल
रे
मन तौता हरि-हरि बोल
तौता-रसना
ज्ञान कथा मत बोल ,मैना वन उपवन में डोल
रंग-रंग के फुल खिले है, बड़े भाग से भोग मिले है ।
सुख
सावन के सुफल भले है,सदानन्दमय अमृत ढले है।
सब
के स्वाद टटोल, मैना वन उपवन में डोल।
मैना-सपने में एक बाग लगाया, फुल फलों से मन ललचाया
जब
छुने को हाथ बढ़ाया, जान पड़ा कुछ भी नही पाया
यथा
ढोल में पोल ,रे मन तौता हरि हरि बोल
तौता-यदि सपना है जग उपासना,जीवन स्वप्न है,स्वप्न
वासना
सपने
की क्या स्वप्न कल्पना,सपने से सपना है अपना
इस
विचार को तोल, मैना वन उपवन में डोल
मैना-इस जग में मत बन मतवाला,यह तन अमर प्रेम का
प्याला
जिसमें
सत स्वरुप रस डाला,तू रस का है पीने वाला
विष
का ‘बिन्दु’ न बोल, रे मन तौता हरि हरि बोल।
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