(१)श्री भगवान ने कहा-
शुचि वृत्ति सात्विक और अभय, आजेय और ज्ञान में
स्थित हो।
इन्द्रिय संयम अरु यज्ञ दान, अवाध्याय और तप
में स्थित हो।
(२)पालन हो सत्य अहिंसा
का, हो क्रोध रहित अरु त्याग भी हो।
निन्दा न किसी की करता हो, जीवों पर दया भाव भी
हो।
(३)दोहा- निज मानस में
शान्ति हो, मन में लोभ न होय।
मृदु अरु लज्जा
युक्त हो, व्यर्थ चेष्टा खोय।
(४)हो तेज क्षमा अरु
धैर्य युक्त, बाहर भीतर से शुद्ध भी हो।
अभिमान न पुज्यपने का हो, अरु सबसे द्रोह रहित
भी हो।
हे अर्जुन यह सब शुभ लक्षण, उनही पुरुषों में
होते है।
जो दैवों सम्पद वाले है, अरु शुद्ध ह्रदय भी होते
है।
(५)हो दम्भ दर्प अभिमान
क्रोध, अज्ञान वाणी कर्कश होवे।
वह आसुरी सम्पद वाला है, जिस नर में यह लक्षण
होवे।
(६)सम्पदा दैवी मुक्ति
के लिये, बन्धन आसुरी सम्पदा है ।
इसलिये शोक मत कर अर्जुन, तुझे दैवी मिली सम्पदा
है।
(७)हे अर्जुन इस संसार
बीच, दो प्रकार के प्राणी होते।
होते है एक दैवों जैसे, दुसरे असुरो जैसे होते।
विस्तार पुर्वक कहा गया, तुझ से स्वभाव ही दैवों
का।
अब यह विस्तार से कहता हुँ, सुन तुझसे स्वभाव असुरों
का।
(८)आसुरी स्वभाव वाले
जन, न प्रवृत्ति निवृति मानते है।
न ही शुद्धि और आचरण श्रेष्ठ ,न ही सत्य बोलना
जानते है।
(९)वे जग को आश्रय रहित
कहें, अरु झुठा भी वह कहते है।
वह बिन ईश्वर के अपने आप, उत्पन्न हुवा वह कहते
है।
यह स्त्री पुरुष संयोग ही से, केवल भोगों के भोगन
करे।
इसके सिवाय और क्या है, अज्ञानी कहे सब लोगन को।
(१०)इस मिथ्या ज्ञान
अवलम्बन से, नष्टात्मा दुख देने के लिये।
होते उत्पन्न अल्प बुद्धि,कुकर्मी जग नाशन
के लिये।
(११) हो दम्भ मान मद
मोह युक्त, आश्रय दुष काम का लेकर के।
वर्तते भ्रष्ट
आचरणों से, मिथ्या सिद्धान्त ग्रहण करके।
(१२)वह अनन्त चिन्ताओं
से ग्रसित, फिर मरण काल तक रहते है।
भोगने में विषयों के तत्पर, बहु हर्ष मानते
रहते है।
(१३)आशा फांसी से बंधे
हुवे, जो काम क्रोध वश करते है।
अन्याय पुर्वक भोगों हित, बहु धनादि संग्रह
करते है।
(१४)यह मैने आज ही पाया
है, अरु प्राप्त मनोरथ होवेगा।
यह पास मेरे इतना धन है, अरु फिर भी यह बहु
होवेगा।
(१५)यह बैरी मेने मारा
है, दुसरा मारने वाला हुँ।
मै ईश्वर हुँ अरु भोगी हुँ, अरु सुखी सिद्ध
बलवाला हुँ।
(१६)बहुत ही बड़ा धनवान
हुँ मै, अरु बहु कुटुम्ब वाला भी हुँ।
हे कौन दुसरा मेरे सम, सब पुरुषों बीच श्रेष्ठ
भी हुँ।
दोहा-दान यज्ञ मै करुगाँ,
हिय में हर्ष मनाय।
इस प्रकार अज्ञान से, मोह जनित हो जाय।
(१७)अनेक प्रकार से भ्रमित
चित्त, जो मोह जाल में फँसते है।
वे विषयों में आसक्त हुवे, फिर असुचि नर्क
में गिरते है।
(१८)वे दम्भी आपको श्रेष्ठ
मान, धन मान के मद में रहते है।
फिर
नाम मात्र के विधि रहित, पाखण्ड से मख को करते है।
(१९)कामना दर्प बल अहंकार,
अरु क्रोध परायण हो करके।
पर मे निज मे स्थित मुझ से, करते है द्वेष निन्दा
करके।
(२०)उन अधम द्वेषी अरु
क्रुरों को, संसार में उत्पन्न करता हुँ।
मै बार बार उन पापियों को, आसुरी योनि में डालता
हुँ।
(२१)वे जन्म जन्म में
मुढ़ पुरुष, आसुरी योनि को पाते है।
अर्जुन मुझको वह प्राप्त न हो, फिर अधोगति
में जाते है।
(२२)काम क्रोध और लोभ
जो हे, यह तीनों द्वार नर्क के है।
आत्मा को अधोगति ले जाते, यह तीनो ही तजने के
है।
(२३)इन तीनो द्वारों
से अर्जुन , जो पुरुष मुक्त हो जाता है।
निज हितहि श्रेय आचरण करे, वह परम गति को पाता
है।
(२४)जो विधि शास्त्र
की तज करके, अपनी इच्छा से वर्तता है।
वह शुभ गति सिद्धी नही पाता, अरु न ही सुख
प्राप्ति करता है।
(२५)इसलिये कार्य अरु
अकार्य में, प्रमाण शास्त्र ही होते है।
एसा तुम जान के कर्म करो, जो शास्त्र विधि
के होते है।इति।
भजन
विनय करते नंद नंदन को,
काटने हित भव बंधन को।
नैया मेरी भवसागर में
, बहती है मझधार ।
आप बिना शरणागत वत्सल
, कौन लगावे पार।
काट
कर यम के बंधन को। विनय…….
अधम उधारण पतितन पावन,
कृष्ण चन्द्र सुख धाम।
सुयश सुनत संतन मुख तुमरोधावे
आपके ग्राम।
लगाकर गोपी चंदन को।विनय……..
प्रेम भक्ति निज पद पंकज,
की मांगो बारम्बार।
दानी शिरोमणि शरणागत
का, करो शीघ्र उद्धार।
मेट दुख दरिद्र द्वन्द्वन
को। विनय………
जगन्नाथ की करुणा विनती,
सुनियो दीन दयाल ।
आठो प्रहर ह्रदय आंगन
में, आप बसो प्रभु आप।
सम्हालो हम मति मन्दन
को।विनय…….इति श्री सो० अ०।
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