Friday, 23 January 2015

नवां अध्याय

    
श्री भगवान ने कहा-
                             (१)यह परम रहस्य युत गुप्त ज्ञान, कहता हुँ दोष रहित तुझसे।
                                  तू मुक्त होयेगा जिसे जान, हे प्रिय अर्जुन जग के दुख से।
                             (२)सब विद्या अरु परम गोप्य यह, हे उत्तम ज्ञान धर्म राशी।
                                   फल हे प्रत्यक्ष व अति पवित्र, साधन को सुगम हे अविनाशी।
(१)इस धर्म में श्रद्धा रहित पुरुष, मेरे को प्राप्त न करते है।
    फिर मृत्यु रुप भव चक्र बीच, वह भ्रमण सदा ही करते है।
                             (४)मेरे अव्यक्त रुप से यह, सब विश्व पूर्ण व्यापक जानो।
                                  सब भुत भाव मुझमें स्थिर है, मै उनमें स्थिर नही यह मानो।
                             (५)सब भुत नही मुझ में स्थिर है, मेरा ही प्रभाव योग देखो।
                                  जग कर्ता भरता मम आत्मा, सब भुतों में स्थिर मत देखो।
                             (६)जैसे सब विश्व भ्रमण कर्ता, महावायु सदा नभ में स्थिर है ।
                                  वैसे ही संपुरण प्राणी , यह जान मित्र मुझमें स्थिर है।
 (७)कल्प के अन्त में सर्वभुत , मम प्रकृति में लय होते है।
अरु कल्पादि में मै उनको,रचता हुँ वे तब होते है।
(८) निज त्रिगुण मयी प्रकृति वश कर स्वाभाविक वश परतन्त्र हुवे।
      मै भुत मात्र को बार बार,्रचता कर्मो को लिये हुवे।
(९) हे अर्जुन इन सब कर्मो में, आसक्ति रहित मै रहता हुँ।
      न ही कर्मो का बंधन मुझको, मै उदासीन वत रहता हुँ।
दोहा- सब जग को प्रकृति रचे, मेरा आश्रय पाय।
          इससे जग वह घुमता, आवागमनहि माय।
(११) मुझ भुतों के ईश्वर का जो, नर परम भाव को नही जाने।
        वे नर तन धारण करने से, मुझ ईश को मुढ़ तुच्छ माने।
दोहा- कर्म वृथा आशा वृथा, वृथा ज्ञान मति हीन।
         मोहक आसुर भाव मय, प्रकृति धारण कीन।
(१३) दैवी प्रकृति के आश्रित जन, अक्षर भूतादि जान करके।
          वे मुझे निरन्तर भजते है, अर्जुन अनन्य ही मन करके।
(१४) कर कीर्तन वन्दन बहु पूजन, एकाग्र चित्त से ध्याते है।
          दृढ़ नेम मनुज वर वे मुझको, भक्ति में युक्त हो पाते है।
(१५) निज ज्ञान यज्ञ द्वारा मुझको, कुछ लोग पुजते रहते है।
कोई नर व्याप्त पृथक कहकर, या एक रुप में भजते है।
(१६) हे भारत श्रोत कर्म मै हुँ, यज्ञादि स्मार्त कर्म मै हुँ।
        पितरों के निमित्त अन्न मै हुँ, सब वनस्पतियाँ भी मै हुँ।
        मंत्र मै हुँ और घृत मै हुँ, अरु अनल बीच भी मै ही हुँ।
        हवन की समस्त क्रिया मै हुँ, हे अर्जुन सब कुछ मै ही हुँ।
(१७) इस जग को धारण करता हुँ, अरु पोषण करने वाला हुँ।
        अरु माता पिता पितामह हुँ,फल कर्म का देने वाला हुँ।
        में हुँ पवित्र जानने योग्य , अरु ओंकार भी मै ही हुँ।
         ऋग्वेद और मै यजुर्वेद , प्रिय सामवेद भी मै ही हुँ।
(१८) मै ही साक्षीगति पोषक हुँ, अरु शरण योग्य मै स्वामी हुँ।
         उत्पत्ति प्रलय का रुप तथा, अविनाशी अन्तर्यामी हुँ।
दोहा- सबका वास स्थान हुँ, अरु आधार निधान।
         मुझे सर्व ही विश्व का, हित कारक भी जान।
(१९) मै सूर्य रुप से तपता हुँवर्षा आकर्षण करता हुँ।
        अरु मेघों से वर्षा करके, सब जग का पोषण करता हुँ ।
         हे अर्जुन  मै ही अमृत हुँ, अरु मृत्यु भी तो मै ही हुँ।
      सत् और असत् भी तो मै ही हुँ, अरु जग में सब कुछ मै ही हुँ।
   (२०) तीनों वेदो से विहित किये, जो सकाम कर्म करने वाले।
         जो सोमपान करने वाले, पापो से युत होने वाले।
            यज्ञों के द्वारा मुझे पुज , जो स्वर्ग की प्राप्ति चाहते है।
          फल इन्द्रलोक में पृथ्वी का, वे देवों के सम पाते है।
   (२१) वे उस विशाल सुरलोक भोग, हत पुण्य जगत में आते है।
            इस भाँति स्वर्ग साधन के रुप, अनुसरण वेद का पाते है।
    (२२) दोहा- विषय भोग की कामना, रहती जिनके माय।
                     बार बार संसार में , आवागमन हि पाय।
      (२३) जो अनन्य भाव से भक्त मुझे, चिन्तन करते अरु भजते है।
               करता मै उनका योग क्षेम, वो नित्य योग युत रहते है।
       (२४) जो श्रद्धा सहित सकामी जन, दुसरे दैवता पुजते है।
               निज विधि से हीन मनुज वे भी, हे पार्थ मुझे ही पुजते है।
        दोहा- सब यज्ञों का भोगता, स्वामी मै हु तात ।
                   मुझे न जाने तत्व से, इससे वह गिर जात।
         (२५) जो सुरगण को पुजने वाले, वे सुरगण को ही पाते है।
               जो पितरो का पुजन करते, वे पितरो से मिल जाते है।
                भूतो को पुजने वाले जन, भूतो को प्राप्त वे होते है।
                 अरु मेरे प्रेमी भक्त पुरुष, वे प्राप्त मुझे ही होते है।
           (२६) पुष्प पत्र जल फल इत्यादि, जो भक्त मुझे अर्पण करता।
                    मति शुद्ध चित्त से प्रेमार्पण , सब अंगीकार मै हु करता।
         (२७) अर्जुन तू कर्म करता खाता, अरु हवन दान तप करता है।
                   वह सब कर मेरे को अर्पण, जो जो तू कुछ भी करता है।
          (२८) इस विधि सन्यास योग वाला, शुभ अशुभ रुप फल बंधन से
                 तू मुक्त होय पावेगा मुझे, निर्द्वन्द होय जग बंधन से।
          (२९) सम भाव से हुँ सब भुतों में, प्रिय अप्रिय नही कोई मुझको।
                 हुँ मै उनमें वे मेरे में, भजते है प्रेम से जो मुझको ।
          (३०) अत्यन्त दुराचारी भी मुझे, जो अनन्य भाव से भजता है।
                   वह निश्चय ही साधुजन है, सत्पथ पर ही वह रहता है।
          (३१) दोहा- शीघ्र होय धर्मात्मा , सदा शांति को पाय।
                             नाश नही मम भक्त का, अर्जुन निश्चय लाय।
          (३२) हे अर्जुन नारी वैश्य शुद्र, अरु पाप योनि जो होते है।
                   पर मम शरणागत जो भी हो, गति परम प्राप्त वे होते है।
          (३३) फिर क्या कहना द्विज पुण्य शील, अरु राजर्षि सेवक जन का
                  इससे नश्वर असुख मनुज तन, पाकर मम भजन निरन्जन का
          (३४) मुझमें ही अचल मन रख करके, मेरा ही निरन्तर भजन करो
                 अरु भक्ति युक्त पुजन करके, मोहि श्रद्धा सहित प्रणाम करो।
          दोहा- इस प्रकार मम शरण हो, कर निज एकी भाव ।
                   मुझको होगा प्राप्त तु, मत चुके यह दाव।इति।
                                      भजन
योगेश्वर श्रीकृष्ण वीर, अब भारत में आवो आवो।
मधुर बेनु फिर आप बजाकर, अमृत रस पावो पावो।
रैन दिवस प्रभु बाट आपकी, भारत पुरुष निहारत है।
दर्श दिखाओ वेग कृपानिधि, भक्त वत्सल धावो धावो।
धेनु सब प्रभु आप बिना नित, रो रो शीश को धुनती है।
बिन अपराध जाय नित मारी, असुर दलन धावो धावो।
नही कोऊ रक्षा करे आप बिन, क्षत्रिय वीर बलहीन भये।
इनमें वीर तत्व की शक्ति, फिर आप लावो लावो।
परतन्त्रता की बेड़ी काटकर, सर्व प्राणी को सुखी करो।
सत् वीर धर्म का नाद जाप, बंसी में फिर गावो गावो।
हम सब ग्वाल बाल भारत के, कर्मवीर बन संग रहे।
करें धर्म बिन आत्म समर्पण , यह शक्ति लावो लावो।
ऋषि बालक हम धर्म भुमि के, धीर वीर फिर कहलावे।
शुभ दिन जगन्नाथ के सन्मुख, शीघ्र आप लावो लावो। इति श्री नवम् अ०

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