अर्जुन ने कहा- (१) हे कृष्ण प्रथम
कर्मो के तुम, सन्यास को उत्तम कहते हो।
अरु फिर निष्कर्म योग की तुम, अत्यन्त प्रशंसा
करते हो।
दोहा- इन दोनों में एक
को , निश्चय किया कृपाल।
वह मारग कल्याण
का, कहिये मुझे दयाल।
श्रीभगवान ने कहा-(२) सन्यास और
निष्कर्म योग, दोनों कल्याण ही करते है।
अरु
इन दोनों में कर्म योग, साधन में उत्तम कहते है।
(३) महाबाहु
जो किसी से नर, इच्छा और द्वेष न करता है।
फिर वह निष्काम कर्म योगी, सन्यास में ही स्थिर
रहता है।
दोहा- राग द्वन्द द्वेषादि से , युक्त मनुज हो जाय
।
जग बन्धन से छुटकर , परम गति को पाय।
(४) सन्यास
और निष्कर्म योग, मुरख जन भिन्न बताते है।
एकी में स्थिर बुध भली भाँति, फल दोनों के सम
पाते है।
(५) जो ज्ञानी
योग पद पाते है, वह योगी निष्कर्मी पाते।
दोनो को सम जो लखते है, वे ही तत्व वेत्ता कहलाते।
(६) निष्कर्म योग बिन हे अर्जुन , सन्यास कठिन हो
जाता है।
निष्कर्म
योग युक्त जो मुनि हो, शीघ्र ही ब्रह्म को पाता है।
(७) मन शुद्ध
जितेन्द्रिय आत्म जयी, निष्कर्म योग करता भी हुवा।
कर्मो में लिप्त नही होता, सब भूत में एकी भाव
हुवा।
(८) जो तत्व
का ज्ञाता योगी है, देखता अरु सुनता भी हुवा ।
स्पर्श करता सुँघता हुवा, अरु भोजन को करता भी
हुवा।
सोता चलता ओ श्वास लेता, अरु त्याग कर्म करता
भी हुवा।
लोचन को खोल बोलता हुवा, नयनों को बंद करता भी
हुवा।
(९) यह भोग
इन्द्रियों के ही है, इन सब कर्मो को वे जाने।
इस प्रकार नर जानता हुवा, मै कुछ नही करता ये
माने।
(१०) कर्मो
को ईश्वर अर्पण कर, तज संग कर्म जो करता है।
जल से पंकज के पत्ते सम, वह पाप से अलिप्त
रहता है।
दोहा- केवल
इन्द्रिय मन मति, तन से भी तज राग।
योगी
आतम शुद्धि हित, कर्म करे सब त्याग।
(११) योगी कर्मो
के फल तजकर , निष्ठा युत शांति पाता है।
फल
में आसक्त सकामी नर, कामना से वह बंध जाता है।
(१२) भव रुप
नगर में रहकर भी, करवाता और न करता है।
संयमी
पुरुष सब कर्मो को ,मन से तज सुख से रहता है।
(१३) परमेश्वर
सर्व प्राणियों के, कर्तापन को नही रचता है।
न
ही फल संयोग न कर्मो को, वास्तव में कभी बनाता है।
(१४) दोहा- होता प्रभु
के निकट से, प्रकृति का सब काम।
गुण
ही गुण में वर्तते, इस प्रकृति के धाम।
(१५) ईश्वर न किसी के
पाप कर्म, अरु न ही शुभ कर्म ग्रहण करता।
माया से जीव
का ज्ञान ढँका, इससे ही जीव मोहित रहता।
(१६) जिस जन का आत्म
ज्ञान द्वारा, अज्ञान नष्ट हो जाता है।
उसका वो ज्ञान
भानु समान, ईश्वर का तत्व दिखाता है।
(१७) तद्रुप बुद्धि अरु
मन जिनका, तन्निष्ट ईश में रहता है।
तत्पर हो ज्ञान
में पाप रहित, नर परम गति पा लेता है।
(१८) विद्वान विनय युत
ब्राह्मण में, गौ श्र्वान भषच अरु हाथी में।
ज्ञानी जन सम
दृष्टि देखे, निज आत्म रुप सब जाति में।
(१९) समभाव में स्थिर
मन जिनका, उन जीवतहि भव जीत लिया।
क्योंकि हे
सम निर्दोष ब्रह्म, सुखपूर्वक ब्रह्म में वास किया।
(२०) प्रिय वस्तु पाकर
हर्ष नही, अरु अप्रिय पाकर दुख नही।
वह संशय रहित
ब्रह्म वेत्ता , स्थिर मति ब्रह्म में लीन वही।
(२१) जो भोगों में आसक्ति
रहित, आत्मा का सुख अनुभव करता।
वही ब्रह्म
योग में स्थिर है, अक्षय सुख की प्राप्ति करता।
(२२) संभोग से इन्द्रिय
विषयों को, उत्पन्न भोग देने वाले।
सुख रुप भासते
विषयो को, पर हे दुख के देने वाले।
सोरठा- रमता नही मति
मान, भोग अनित्यो मे कभी।
हे भारत यह जान, निःसंशय बातें कही।
(२३) जो काम क्रोध का
वेग प्रबल, तन त्याग पूर्व में सहता है।
वह नर इस लोक
में योगी है, वह पूर्ण सुख से रहता है।
(२४) जो निश्चय अन्तर
आत्मा में, आराम तथा सुख पाता है।
वह योगी पाता
शांत ब्रह्म, जो अन्तरज्योति वाला है।
(२५) जो पाप रहित संशय
नाशी, सब भुत के हित में रहता है।
एकाग्र चित्त
ब्रह्मज्ञ पुरुष, पर ब्रह्म प्राप्त कर लेता है।
(२६) जो काल क्रोध से
रहित हुवे, अरु जिते हुवे चित्त वाले।
सब और ब्रह्म
को पाते है, ज्ञानी ईश्वर में रति वाले।
(२७) बाहर के सारे विषय
भोग, मन से ही बाहर त्याग करे।
नैत्रों की
दृष्टि को अपनी, स्थिर कर भ्र्कुटि के बीच धरे।
दोहा- मध्य नासिका मे
रहे, वायु प्राण अपान।
इन दोनों को
सम करे, युक्ति योग प्रमाण।
(२८) जीतो इन्द्रियाँ
अरु मन बुद्धि, इच्छा भय क्रोध से रहित हुवा
वह मोक्ष परायण मुनि सदा, जग के बंधन से मुक्त
हुवा।
(२९) अर्जुन
मुझको तप मख भोक्ता, सब लोकों का ईश्वर जाने।
सब
जीव मात्र का मित्र जान, शांति को प्राप्त हो सुख माने।
भजन
नर कृष्ण चरण चित्त धरना
, नर कृष्ण चरण चित्त धरना …….
शंख चक्रधारी ,श्रीकृष्ण
मुरारी हम शरण तिहारी ।
लेव भव से उभारी, यही
पुकार नित करना।नर कृष्ण……
ब्रह्म ज्ञान वारे, नंद
भुप के दुलारे, काज भक्तन के सारे।
हम ठाडे तोरे द्वारे,
मम ह्रदय प्रेम रस भरना।नर कृष्ण ……..
कृपा दृष्टि कर, ज्ञान
ह्रदय भर, जन्म मरण हर।
हम हे दुखित नर, जब आवे
तुमरे शरणा। नर कृष्ण….
प्रभु गुरुवर ज्ञानी,
सब ऋषि मुनि जानी, यह सत्य वेद वाणी।
कवि जगन ने मानी, हरि का ही भजन नित करना। नर कृष्ण……
नर कृष्ण चरण चित्त धरना……….इति
पंचम अध्याय
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