Wednesday, 6 November 2013

महाकवि कालिदास


संस्कृत साहित्य के इतिहास में महाकवि कालिदास का नाम सर्वोपरि है। श्री कालिदासजी ने हर क्षैत्र में हास्य करुणा श्रृंगार प्रकृति चित्रण आदि सभी विषयों का बहुत सुन्दर और अलौकिक चित्रण किया है, किन्तु इन सबसे हटकर कालिदास के साहित्य में भारतीय जनता की राष्ट्र निर्माण शक्ति का स्पष्ट परिचय मिलता है।
कवि तो बहुत होते है, पर एसे कवि कम ही होते है, जिन्हें राष्ट्र की समग्र सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्ति देने की कला का अधिकार होता है।कालिदास एसी ही राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना को मुर्ति देने वाले महान कवि है।भारतवर्ष के ऋषियों ,सच्चे कलाकारों ,राजपुरुषों, और विचारको ने जो कुछ उत्तम और महान किया है,उसके सहस्त्रो वर्षो के इतिहास का जो कुछ सौंदर्य है ,उसने मनुष्य को पशु तुल्य धरातल से उठाकर देवत्व में प्रतिष्ठित करने की जितनी विधियों का संधान किया है, उन सबको ललित, मोहक और सशक्त भावी देने का काम कालिदास ने किया है।
                                      भारतवर्ष बहुत विशाल देश है। स्थान मे भी और काल मे भी। यह विशाल भुखण्ड भौगोलिक दृष्टि से सब प्रकार से एक अविभाज्य ईकाइ है। उत्तर में पर्वतराज हिमालय दोनों भुजाओं से पूर्व और पश्चिम समुद्र को छुता हुआ इस प्रकार छाया हुवा है, मानो पृथ्वी का मापदंड हो। कालिदास ने कहा है- अस्यु देवतान्या नगाधिराज हिमालय द्वारा विभाजित समुद्र मेलय भारतभुमि ही वह राष्ट्र है ,जो कालिदास की वाणी में अपने सम्पूर्ण आध्यात्मिक और आधिभौतिक वैभव के साथ प्रकट हुवा है।
          कालिदास के आविर्भाव काल तक बाहर से अनेक मानव मँडलिया इस देश में आ चुकी थी,कुछ आक्रामक रुप में आई, कुछ इस देश की उर्वरा भूमि में बस जाने की कामना से। उनके विभिन्न प्रकार के आचार विचार वाद्य गीत उत्सव आयोजन आदि ने इस महान देश की जलमंडली के वैचित्र्य में वृद्धि की ।मानव मंडलियाँ इस देश का अंश बन गई। यहाँ के मनीषियों के आध्यात्मिक विचारों से वे प्रभावित हुई।साथ ही इस देश के रहन-्सहन को प्रभावित करने में भी समर्थ हुई। यह देश मानों विधाता की ओर से ही समस्त धर्म और संस्कृतियों का संगमस्थल बनाया गया था। नाना आचार विचारों विश्वासों की मिलन भुमि होने के कारण इस देश की संस्कृति में अनेक प्रकार के वैचित्र्य है, काव्य में,चित्र में, मूर्ति में, वस्तु में,नृत्य गीत वाद्य में और नाटक आदि प्रमुख कलाओं में नवीन बातों का समावेश होता गया।और एक प्रकार की प्रच्छन्न गतिशीलता का प्रादुर्भाव हुआ ।इस बहु विचित्र जलमंडली के सर्वोत्तम को रुप ललित रुप देना ही मर्मभेदिनी दृष्टि और अर्थसाहित्य शक्ति का परिचायक है।कालिदास इस महान शक्ति से ओतप्रोत थे।इसीलिए वे सम्पूर्ण राष्ट्रीय चेतना को ललित रुप देने में कृतकार्य हुए।
                                                                                                                                                                                                                                                                          

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