प्रलयकाल तक घोर तमोमय असुरधाम में पड़ते वो।
विज्ञाननीतिपक्ष- काम्यकर्म से आवृत हो नर तज देता
निज ज्योतिर्लोक।
औ पाता है जन्म मरणभय असुर्य यानी तनुमय लोक।
४.अनेजदेकं मनसो जवीयो, तैनदेवा आप्नुवन पूर्वमर्जत।
तत् धावतो
अन्यानत्येति तिष्ठत्, तस्मिन्नपो मातरिधा दधाति।
आत्मतत्व
अपने स्वरुप से नाही चलने वाला है।
एक
रुप है तथैव मन से भी सुतीव्रगति वाला है।
प्राप्त
न करती जिसे इन्द्रियां` उनसे पूर्व गमन करता।
स्थिर
होकर अन्यो से आगे उसमे जीव कर्म धरता।
५.तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य
सर्वस्व तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।
आत्मतत्व
चलनेवाला है, और न चलनेवाला है।
दूर,
पास, सबके अन्तर्गत, सब से नया निराला है।
विज्ञान-विषययुक्त मति अशुद्ध बनकर आत्मा से हो रहे
अयुक्त।
कार्या कार्य न जाने वह मति है ही नही अविद्यायुक्त।
मुक्तात्मा
मानता अचल वो है उसके समीप का तत्व।
संसारी
के लिए दूर है ,ज्ञान कर्म संयुत् वह तत्व।
ज्ञान
कर्म जिज्ञासु मानता, उपासना है सुबुद्धियोग।
विद्या
स्थिति औ बने कर्म गति, यजु है स्थिति गति
का संयोग।
६.यस्तु सर्वानि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्व भूतेषुचात्मानं ततो न विजुगुप्सते।
जो
सब भूतों को विलोकता, अपने आत्मा में ही है।
सब
भूतों में आत्मा को , इसके कारण न घृणा ही है।
विज्ञान-आत्मा में ही कर्मभाग है , इसको ही कहते
है ज्ञान
विश्वकर्म भी ज्ञानयुक्त है, इसको कहते है विज्ञान।
आत्मा
तथा विश्व संयुत है, निश्चय जाने बद्धि विशेष।
स्तुति
–निन्दा से है अतीत वह, जिसमें नही है रागद्वेष।
राग
द्वेष सेमोह मोहहत बुद्धि न कर पाती कुछ ध्यान।
निर्बल
मति मन को बल देते, वह मति को करता वेभान।
७.यस्मिन्नसर्वानि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः
तत्र को
मोहः कः शोकं एकत्वमनुपश्यन्तः।
सब
पदार्थ ज्ञानी को आत्मा ही होते प्रतिभात जहाँ।
उस
एकत्व –तत्वदर्शी को , मोह कहाँ औ शोक कहाँ।
विज्ञान-
नानाभाव मोह उपजाते , द्वेष शोक पैदा करता।
ब्रह्म-कर्म
अद्वेत रुप है , शोक मोह को जो हरता।
बह्म
एक यों श्ब्द जानना, मनकी श्रद्धा का है काम।
कारण-कार्य
विशेष जानना, बद्धियोग है निश्चय नाम।
यहाँ
द्वेत-अद्वेत भेद के अलग-लग अधिकारी जान।
द्वेत
भाति तज ब्रह्म कर्म मय , बना कहा श्रुति ने विज्ञान।
८.सपर्याच्छुक्रमकायमव्रण, मस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी
परिभूः स्वयंभूः याथातथ्यतो, अर्थात् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः।
शुद्ध,
सर्वगत, अकाय, अक्षत ,स्नायुरहित वह आत्मा है।
निर्मल,
अपात्र, सुकवि मनीषी सबसे श्रेष्ठ स्वयंभू है।
अनादि
से ही इन्द्रियाणा श्री उनके विषयो को उसने ,
योग्य
रीति से तथा व्यवस्थापूर्वक निश्चित है कोई।
विज्ञान- विराट्
से उपजाता ‘शुक्र’ व उसे घेरता वायु- वराह।
जगत्
शुक्र से पैदा करता , परम्परागत नदी प्रवाह।
शुक्र
आप औ अग्निभागमय महद ब्रह्म है उभय समष्टि।
विजातीय
औ सजातीय के धर्म मिलन मे है यह सृष्टि।
कवि
से काया मनीषी से व्रण , परिभू से है सस्नायु शुक्र ।
और
स्वयंभू धर्म वायु से पापयुक्त बनता है शुक्र।
सृष्टि-वायु
ने यों ही की थी , जैसी यह दिखती है आज।
उर्ध्व
अग्नि का जाना’ वैसे भविष्य में भी होगे आज।
९.अन्धः तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते ।
ततो भूय
इव ते तमा य तु विद्यायां स्ताः
अन्धकार
में प्रवेश करते , जो है कर्म- अविद्याभक्त।
उनसे
भी ज्यादा उनमें वे जाते, जो है विद्याभक्त।
१०.अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुर विद्यया ।
इति
सुश्रुम धीराणां ये तस्तद्विचचक्षिरे।
विद्या
और अविद्या से फल और-और ही बतलाया।
ये
सुनते उन धीरो से, जिनने हमसे उपदेश किया।
विज्ञान- ज्ञान
कर्म से भी है आत्मा –भिन्न रुप कहते मतिमान।
सर्वत्र
व्यष्टि- समष्टि में है मिलता ज्ञान व कर्म समान।
दोनों
का आधार प्राण-चित्त- सोमत्वरुप है विज्ञान।
विज्ञान
बुद्धि रवि प्रधान है चन्द्रमुख्य है मन-प्रज्ञान।
हम
जिस ज्ञान- कर्म के ज्ञाता है वह महिमा रवि की रम्य।
है
सोमाधिक विज्ञानात्मा ,शुद्धात्मा है अनुभवगम्य।
११.विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया
मृत्युं तीर्त्वा विद्यया अमृतश्रुते।
विद्या
और अविद्या दोनों को जो साथ जान लेता ।
तरकर
मृत्यु अविद्या से ही विद्या से चिरपद लेता।
१२.अन्ध तपः प्रविशन्ति ये अन्धभूतिमुपासते।
ततो
भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्वां रताः।
असंभूति
की उपासना से होते अन्धकार प्रविष्ट।
संभूविलीन
जो है वे उनसे भी ज्यादा उभ्यनिष्ट।
१३.अन्यदेबाहुः सन्भवाद्न्यदाहुरसम्भवाद।
इति
शुश्रुम् वीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।
उत्पत्ति
और विनाश से है भिन्न-भिन्न फल बतलाता।
यों
सुनते उन वीरों से जिनने हमसे उपदेश किया।
संभूति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्वा अमृत्मस्नुते।
उत्पत्ति
और विनाश इन दोनों को साथ-साथ लेता।
विनाश
से ही तेर मृत्यु को अमृत जन्म से पा लेता।
विज्ञान-
सम्भूति और विनाश को जो एक बिन्दु पर लेता जान।
निष्काम भक्ति जग की करता ,दृष्टि अमृत पर है
धीमान।
१५.हिरण्ययेन पात्रेन सत्यस्याविहितं मुखम्।
तत्वम्यूपषपावृणु
सत्यधर्माव द्रष्टये।
सुसत्य
का मुख ढँका हुआ है, सोनेके-से सुपात्र से।
पोषक उघाड़ सत्यधर्म को दिखलाने के लिए उसे।
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रस्मिन्त्समूह।
तेजो यत्ते रुपे कल्याणतमं तत्ते पश्यामि,यो असावसौ
पुरुषः सो अहमस्मि।
हे
जगपोषक सविता हे यम एकाकी रहनेवाले ।
अहो
प्रजापतिनन्दन तू अपनी किरणों को सिमटाले।
तज
स्वरुप जो अविमंगलमय उसका दर्शन करता है।
मत्यार्ग्नि
देह है अमृताग्नि हि पुरुष रुप में रहता हूँ।
विज्ञान-
जग का मूल प्रवर्तक ऋषि है ,उसको ही कहते है प्राण।
यजु का ‘यत्’ ऋषिगण जाति से एकर्षि आदि बना प्रमाण।
एकर्षि भौम, अन्तरिक्ष यम, सूर्य दिव्य ही पूषाप्राण
।
कृष्णकिरण है सौरतेज है, देखूँ तब मन तनुकल्याण।
अग्नि, वायु रवि ही वैश्वानर हिरण्यगर्भ तथा सर्वज्ञ
।
इसका अंश ही जीवात्मा है-वैश्वानर तेजस औ यज्ञ।
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ऊँ क्रतो स्मर कृतंस्मर कृतो स्मर ,कृतंस्मर।
प्राण
अप्रार्थिव स्वामृत है औ देह अन्त में है भ्स्मौ।
ऊँ
स्मरण कर क्रतो स्मरण कर , स्मरण करो है क्रतकर्मो।
विज्ञान-
भौतिक धातु इरा कहलाती, इससे तनु बनती वायु।
मध्यवायु ही औज बना है , दिव्य द्वन्द्व से मन
सुररुप।
मध्य प्राण यदि इरा युक्त है, तो यह पाता मृत्यु
हि भाव।
भू-विषयों में अनासक्त है तो वह पाता अमृतत्वभाव।
क्रतु का अर्थ इरादा है ,औ दक्ष सफलता का ‘कृत’
नाम।
स्मरण करो संकल्प कर्म का कृत का स्मरण करो निस्फल।
निज-ज्ञानार्थ
इरादा क्या था, और किया क्या है व्यवहार।
सुसंकल्प
श्रवणानुकूल हो तथा कार्य वह सिद्धी द्वार।
अग्रे वय सुवथा राये अस्मान्।
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुगणयेनो।
भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेय।
हमें
कर्मफल को हि भोगने ले चल प्रकाशदाता अग्नि।
सुमार्ग
से हे देव , सभी कृतकर्मो के ज्ञाता हे अग्नि।
सब
पाखंडी पूर्ण हमारे पापों को तू विनष्ट कर।
तेरी
सेवा के ही हित हम कहते हे बहु-बहु नमकर।
विज्ञान- आदि
स्वयं ब्रह्म संज्ञ है देवसत्व है सर्वज्ञ हि
सभी
तत्व ये अग्निरुप है, स्वयंभू-वाग्-देवान्नादादि।
अस्ति
भाति औ उभ्य दृष्टि से दृश्य वस्तु सब वयुन अभिन्न
वयुन
ईश का फल कहा है नमः मनुष्य रुप है अन्न ।
प्रभु से प्राप्त भाग को भोगों , परधन मत लो , करो
स्वकाम।
सूर्यात्मा हो, कृतसंकल्पी लगो स्वकर्मो में निष्काम।
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