१.नासदासीन्नो सदासीत् तदन्तीं, नासीद्रजो नौ व्योमापरो
यत्।
किमावरविः कुह कस्य सर्वत्, नम्भः किमासीद्वह्नं
गभीरम्।
सृष्टि
प्रथम नही बनी हुई थी एवं न शून्य स्थिति में थी।
नहि
ऊपर का नीला नभ था, नहि आरंभिक स्थिति में थी।
२.न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि, न राज्या अदन आसीत् प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदेकं , तस्माद धान्यन्न परः किं
च नाम।
उस
समय मृत्यु नही थी, एवं किसी चीज का जन्म न था।
तथा
रात्रि का पता नही था, दिखने वाला दिवस न था।
३.तम् आसीत् तमसा गूढ़मये , अग्रकेतं सलिलं सर्वमा
इदम्।
तुच्छेनाम्बविहितं यदासीत्, तपसन्तन्महिना जायतैकं
।
तब
केवल आरम्भकाल का पूर्वरुप था अन्धकार।
एक
गतिरहित कुहर समान हि माया का ही था विस्तार।
४.कामस्तदग्रे समवर्तताअधि, मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतोबन्धुमसतो निरविन्दत्, ह्रदि प्रतीष्या कवयो मनीषा।
जीवकर्म
का बीज इसी से प्रभु के मन में उपजा काम।
कवि मति से विचार कर मन में , जाने रस बलबंध
तमाम।
५.तिरथीनो विततो रश्मिरेषा, मधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत्।
रेतोधा आसन् महिमान आसन्, स्वधा अवस्तात् प्रयतिः
परस्तात्।
द्रव्यों
की किरणें तिरछी, नीचे ऊपर की फैल गई।
प्राणी,
अचर, चर और अब ऊपर नीचे प्रकृति हुई।
६.को अद्वा वेद क इह प्रवोचत्, कुत आजाना कुत इयं
विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेना , अथा को वेद यत् आबभूव।
सृष्टि
कहाँ से उपजी है, यह ठीक जानता- कहता कौन।
विपुल
जगत के भी बनने में पीछे अपने जाने कौन।
७.इयं विसृष्टिर्यत् आबभूव , यदि वा दवे यदि वा न
।
यो अस्याध्यक्ष; परमे व्योमेन , त्सो अंगः वेद यदि
वा न वेद।
विविध
सृष्टि जिससे उपजी, वह धारण करता है या ना।
इसका अधिपति नभवत व्यापक
है देव \ वह जाने या ना
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