Saturday, 17 August 2013

मेघदूत


       
‘महाकवि कालीदास’ संस्कृत साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र ,जिनकी ज्योति सम्पूर्ण विश्व में आज भी अपना प्रकाश फैला रही है। डेढ़ हजार वर्ष बीत जाने पर भी अपने साहित्य रुपी संसार में आज भी अमर है।इस महान कवि की विद्वत्ता के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा।कवि कालीदास ने लगभग चालीस से भी अधिक ग्रन्थों की रचना की है,परन्तु उनकी सात रचनाएँ अधिक प्रसिद्ध हुई।जिनमें तीन नाटक और चार काव्य है।नाटकों के नाम है-१.मालविकाग्नि मित्र २.विक्रमोर्वशीय ३. अभिज्ञानशाकुन्तल तथा काव्यों के नाम है- १ऋतु संहार २. मेघदूत ३.रघुवंश ४.कुमारसंम्भव। काव्यों में मेघदूत सबसे छोटा है, किन्तु काव्य रसिकों ने इसे सबसे अधिक सराहा है।
                             मेघदूत का नायक राजा कुबेर की सेवा में एक अनुचर है।वह अपनी प्रेयसी में अत्यधिक अनुरक्त रहता है।एक दिन प्रिया में अधिक अनुराग होने के कारण राजा कुबेर की सेवा में त्रुटि हो जाती है, इस पर कुबेर कुपित होकर उसे आदेश देते है कि तुम एक वर्ष के लिए अपनी पत्नि से अलग रहोगें। तब वह अपनी पत्नि को अलका में छोड़कर रामगिरि पर्वत पर प्रवास का समय बिताने के लिए चले जाते है।जैसे-तैसे प्रिया के विरह में कुछ महिने तो काट दिए, किन्तु जब वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई, और काले कजरारे बादल आकाश में उमड़ने-घुमड़ने लगे, तो उससे और नही सहा गया। अलका की ओर उड़ते बादलों को देखकर उसने सोचा- क्यों न बादल को ही मित्र बनाकर विरह में दुखी प्रिया को अपना सन्देश भेज दूँ।
                   तब उसने कुटज के ताजे फूल अंजलि भरकर मेघ को समर्पित किए,और अपना सन्देश कहा-वह रामगिरि से लेकर अलका तक का मार्ग मेघ को बड़ी मार्मिकता से बताता है।
‘मेघदूत’ में अपनी प्रियतमा से बिछुड़े हुए पति के ह्रदय का एसा दर्दभरा चित्रण कवि ने किया है कि इसकी एक-एक पंक्ति पाठक को रस विभोर कर देती है। मेघदूत वियोग श्रंगार की एसी रस भरी कविता है कि पाठक को अपने में डुबो देती है।
सावन के समीप आने पर
प्रिया के प्राणों को सहारा देने के उद्देश्य से
उसने मेघ द्वारा ही
कुशल-संदेश भेजना चाहा
टटके कुटज के फुलों से अंजलि भर
गदगद यक्ष ने, मधुर वचनों से उसका स्वागत किया।
संत्पत्तों के शरण हो तुम मेघ ,जले हुओं के आश्रय
इससे धनपति कुबेर के क्रोध के कारण
प्रिया से बिछुड़े ,मुझ अभागे का संदेशा
उस प्रिया के पास तुम्ही ले जाओ
तुम्हे अलका जाना होगा,यक्षों की उस प्रसिद्ध पुरी को
वहाँ के भवनों को ,उनके बाहरी बगीचे मे बेठे
शिव के ललाट की चाँदनी धवल धोती रहती है
चलते चले जाना मेघ ,अविराम गति से बिना रुके ,बगेर दम लिए
और अवश्य देखना ,मेरी एकमात्र पत्नि, अपनी भावज को
जो मेरी राह जोहती ,विरह के बचे दिन गिनने में लगी होगी।
इस आशा से कि लौटुगा,जानो कि नारी का ह्रदय कुसुम सा कोमल होता है
पर विरह मे झ्ट टुटकर ,इसी कारण गिर नही पड़ता
कि संयोग की आशा उसे रोके रहती है,फुल की ही तरह
जिसे नीचे का जाना रोक लेता है, टूटकर उसे बिखर जाने नही देता।
वह देखो सामने बांबी के पीछे से
जड़े रत्नों की झिलमिल ज्योति सा जो निकला आ रहा है
वह इन्द्रधनुष का खंड है,उससे तुम्हारा यह श्याम तन
और भी कमनीय हो उठेगा,रंग बिरंगा सुन्दर
जैसे झिलमिलाते मोरपंख से गोपालकृष्ण का शरीर हो।
जलद,तुम्हारे वहाँ पहुँचने के समय ,यदि वह सुख की नींद सो रही हो
तब तुम गरजना बन्द कर, शांत हो पहर-भर निश्चय उसके जगने की राह देखना
कहीं एसा न हो कि स्वप्न में जैसे-तैसे उपलब्ध मुझ प्रणयी के गाढ़ालिंगन के समय
गले मे डाली हुई बाँहो की गाँठ खुल जाय।
सुहागिन तुम मेघ को अपने पति का प्रिय मित्र समझो
उसके संदेश को हिये मे डालकर तुम्हारे निकट आया हूँ।
जानो मुझे यह मेघ जो अपने घोर-गंभीर मधुर नाद से
प्रियाओं को विरह में बंधी वेणी खोलने को आतुर
राह मे कितने परदेशी पतियो को घर शीघ्र लोटाने को प्रेरित करता है।
प्रिये श्यामलता मे तुम्हारे छरहरे तन की छटा पा लेता हूँ
चितवन डरी हिरणियों की आँखों मे पा लेता हूँ
  मुँह की शोभा चन्द्रमा में,केश मोरों के पंखदल में
तुम्हारी बाँहो के तेवर ,नदी की हलकी नीली लहरियो में देख लेता हूँ।
पर हाय । कठोरह्रदये ,कही भी एकत्र तुम्हारी समता नही मिलती।
प्यार मे रुठी मान किए हुए तुम्हारे रुप को गेरु से शिला पर बनाकर
जब मानभंजन के लिए तुम्हारे चरणों मे पड़ा अपना सिर बनाने लगता हूँ
तभी आँसू बार-बार उमड़ कर ,मेरी दृष्टि बन्द कर देते है।
देखो, क्रुर देव ।चित्र तक में हमारा मिलन नही सह पाते।
जलद मित्रभाव से या मुझ विरही पर दया के विचार से
मेरी यह अनुचित विनय मानकर ,मेरा कार्य कर देना
फिर पावस की संपदा से संयुक्त जहाँ चाहो विचरणा
मेरी तुम्हारे लिए बस यही कामना है कि क्षण-भर के लिए भी
अपनी बिजली से ,मेरी तरह तुम्हारा कभी वियोग न हो।
                             साहित्य रसिको के लिए मेघदूत अत्यन्त रोचक है।बहुत ही संक्षेप में इसका वर्णन किया है।इति श्री।

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