Sunday, 25 August 2013

अनुराग



लड़की-मेरा राजा बेटा बुझों एक पहेली।
          प्यारी-प्यारी आँखों की कौन सहेली
लड़का-निंदिया
लड़की-मेरा राजा बेटा बुझों एक पहेली।
          सोये जग, जागे सारी रात अकेली
लड़का-माँ
लड़की-बन-ठन के आये निंदिया जगाये
          चान्द के माथे पे बिंदिया लगाये
          मुखड़े पे चमके चन्द्र किरण
          मेरा राजा बुझे एक पहेली
          कौन सी दुल्हन नार-नवेली,बोलो क्या?
लड़का-रात
लड़की-खोया अन्धेरे मे मेला जहाँ का
          नैन-झरोखों से सपनों ने झाँका
          धीरे-धीरे चले री पागल पवन
          मेरा राजा बेटा बुझे एक पहेली
          चन्दा के बालों में महके चमेली
लड़का-गजरा
लड़की-हाँ   …..हाँ…….हाँ…….

Saturday, 17 August 2013

मेघदूत


       
‘महाकवि कालीदास’ संस्कृत साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र ,जिनकी ज्योति सम्पूर्ण विश्व में आज भी अपना प्रकाश फैला रही है। डेढ़ हजार वर्ष बीत जाने पर भी अपने साहित्य रुपी संसार में आज भी अमर है।इस महान कवि की विद्वत्ता के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा।कवि कालीदास ने लगभग चालीस से भी अधिक ग्रन्थों की रचना की है,परन्तु उनकी सात रचनाएँ अधिक प्रसिद्ध हुई।जिनमें तीन नाटक और चार काव्य है।नाटकों के नाम है-१.मालविकाग्नि मित्र २.विक्रमोर्वशीय ३. अभिज्ञानशाकुन्तल तथा काव्यों के नाम है- १ऋतु संहार २. मेघदूत ३.रघुवंश ४.कुमारसंम्भव। काव्यों में मेघदूत सबसे छोटा है, किन्तु काव्य रसिकों ने इसे सबसे अधिक सराहा है।
                             मेघदूत का नायक राजा कुबेर की सेवा में एक अनुचर है।वह अपनी प्रेयसी में अत्यधिक अनुरक्त रहता है।एक दिन प्रिया में अधिक अनुराग होने के कारण राजा कुबेर की सेवा में त्रुटि हो जाती है, इस पर कुबेर कुपित होकर उसे आदेश देते है कि तुम एक वर्ष के लिए अपनी पत्नि से अलग रहोगें। तब वह अपनी पत्नि को अलका में छोड़कर रामगिरि पर्वत पर प्रवास का समय बिताने के लिए चले जाते है।जैसे-तैसे प्रिया के विरह में कुछ महिने तो काट दिए, किन्तु जब वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई, और काले कजरारे बादल आकाश में उमड़ने-घुमड़ने लगे, तो उससे और नही सहा गया। अलका की ओर उड़ते बादलों को देखकर उसने सोचा- क्यों न बादल को ही मित्र बनाकर विरह में दुखी प्रिया को अपना सन्देश भेज दूँ।
                   तब उसने कुटज के ताजे फूल अंजलि भरकर मेघ को समर्पित किए,और अपना सन्देश कहा-वह रामगिरि से लेकर अलका तक का मार्ग मेघ को बड़ी मार्मिकता से बताता है।
‘मेघदूत’ में अपनी प्रियतमा से बिछुड़े हुए पति के ह्रदय का एसा दर्दभरा चित्रण कवि ने किया है कि इसकी एक-एक पंक्ति पाठक को रस विभोर कर देती है। मेघदूत वियोग श्रंगार की एसी रस भरी कविता है कि पाठक को अपने में डुबो देती है।
सावन के समीप आने पर
प्रिया के प्राणों को सहारा देने के उद्देश्य से
उसने मेघ द्वारा ही
कुशल-संदेश भेजना चाहा
टटके कुटज के फुलों से अंजलि भर
गदगद यक्ष ने, मधुर वचनों से उसका स्वागत किया।
संत्पत्तों के शरण हो तुम मेघ ,जले हुओं के आश्रय
इससे धनपति कुबेर के क्रोध के कारण
प्रिया से बिछुड़े ,मुझ अभागे का संदेशा
उस प्रिया के पास तुम्ही ले जाओ
तुम्हे अलका जाना होगा,यक्षों की उस प्रसिद्ध पुरी को
वहाँ के भवनों को ,उनके बाहरी बगीचे मे बेठे
शिव के ललाट की चाँदनी धवल धोती रहती है
चलते चले जाना मेघ ,अविराम गति से बिना रुके ,बगेर दम लिए
और अवश्य देखना ,मेरी एकमात्र पत्नि, अपनी भावज को
जो मेरी राह जोहती ,विरह के बचे दिन गिनने में लगी होगी।
इस आशा से कि लौटुगा,जानो कि नारी का ह्रदय कुसुम सा कोमल होता है
पर विरह मे झ्ट टुटकर ,इसी कारण गिर नही पड़ता
कि संयोग की आशा उसे रोके रहती है,फुल की ही तरह
जिसे नीचे का जाना रोक लेता है, टूटकर उसे बिखर जाने नही देता।
वह देखो सामने बांबी के पीछे से
जड़े रत्नों की झिलमिल ज्योति सा जो निकला आ रहा है
वह इन्द्रधनुष का खंड है,उससे तुम्हारा यह श्याम तन
और भी कमनीय हो उठेगा,रंग बिरंगा सुन्दर
जैसे झिलमिलाते मोरपंख से गोपालकृष्ण का शरीर हो।
जलद,तुम्हारे वहाँ पहुँचने के समय ,यदि वह सुख की नींद सो रही हो
तब तुम गरजना बन्द कर, शांत हो पहर-भर निश्चय उसके जगने की राह देखना
कहीं एसा न हो कि स्वप्न में जैसे-तैसे उपलब्ध मुझ प्रणयी के गाढ़ालिंगन के समय
गले मे डाली हुई बाँहो की गाँठ खुल जाय।
सुहागिन तुम मेघ को अपने पति का प्रिय मित्र समझो
उसके संदेश को हिये मे डालकर तुम्हारे निकट आया हूँ।
जानो मुझे यह मेघ जो अपने घोर-गंभीर मधुर नाद से
प्रियाओं को विरह में बंधी वेणी खोलने को आतुर
राह मे कितने परदेशी पतियो को घर शीघ्र लोटाने को प्रेरित करता है।
प्रिये श्यामलता मे तुम्हारे छरहरे तन की छटा पा लेता हूँ
चितवन डरी हिरणियों की आँखों मे पा लेता हूँ
  मुँह की शोभा चन्द्रमा में,केश मोरों के पंखदल में
तुम्हारी बाँहो के तेवर ,नदी की हलकी नीली लहरियो में देख लेता हूँ।
पर हाय । कठोरह्रदये ,कही भी एकत्र तुम्हारी समता नही मिलती।
प्यार मे रुठी मान किए हुए तुम्हारे रुप को गेरु से शिला पर बनाकर
जब मानभंजन के लिए तुम्हारे चरणों मे पड़ा अपना सिर बनाने लगता हूँ
तभी आँसू बार-बार उमड़ कर ,मेरी दृष्टि बन्द कर देते है।
देखो, क्रुर देव ।चित्र तक में हमारा मिलन नही सह पाते।
जलद मित्रभाव से या मुझ विरही पर दया के विचार से
मेरी यह अनुचित विनय मानकर ,मेरा कार्य कर देना
फिर पावस की संपदा से संयुक्त जहाँ चाहो विचरणा
मेरी तुम्हारे लिए बस यही कामना है कि क्षण-भर के लिए भी
अपनी बिजली से ,मेरी तरह तुम्हारा कभी वियोग न हो।
                             साहित्य रसिको के लिए मेघदूत अत्यन्त रोचक है।बहुत ही संक्षेप में इसका वर्णन किया है।इति श्री।

Friday, 9 August 2013

सामवेद का पुरुष सुक्त


१.ऊँ सहस्त्र शीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्।
  संभूति विश्वतोः वृत्यात्यतिष्ठत् दशांगुलम्।
                             अनन्त मस्तक , अनन्त आँखे, अनन्त पदवाला पुरुष।
                             पृथ्वी को चहूँ ओर घेरकर स्थित है अंगुल अधिक दश।
२.पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं ।
   उतासृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।
                             भूत, भविष्य व वर्तमान में वह सब परमात्मा ही है।
                             अन्न सुखो से अति ही ऊँचा अमर पाने का स्वामी है।
३.एतावानस्य महिमानो ज्यायांश्च पुरुषः।
    पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादास्यामृतम् दिवि।
                                      इसकी इतनी महिमा है परमात्मा इससे ज्यादा है।
                                      इसका एक अंश सब प्राणी , तीन भाग स्वर्गामृत है।
४.त्रिपादूर्ध्वम् उदैन्पुरुषः पादो अस्येहाभद्त्युत्।
    ततो विष्वड़् व्यश्रामत्साशनानशने अभि।
                                      तीन भाग परमात्मा ऊपर उच्च भाग में प्रकाशता।
                                      इसका भाग यहाँ फिर बनता विविध विभक्त भोग्य भोक्ता।
५.तस्माद्विराडजायत विराजो अधिपुरुषः।
    सजातो अत्यरिच्यत पश्चात भूमिमथो पुरः।
                                      इससे विराट् बने , विराट् पर एक नियामक पुरुष बने।
                                      पैदा होकर विविध बना वह , प्रथम भुमि फिर देह बने।
६.यत्पुरुषेन हविधा देवा यज्ञमतन्वत।
   वसंतो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्यः शरद हविः
                                      यज्ञ किया देवों ने जब परमेश्वर –रचित सृष्टि हवि थी।
                                      उसका घी बसंत था, इन्धन ग्रीष्म शरद ऋतु ही हवि थी।
७.तं यज्ञं बर्हिषि प्रौज्ञन्पुरुषः ज्ञानमग्रतः ।
तेन देवा अजयंत साध्या ऋषयश्च्ये।
                                      प्रथम प्रकट उस यज्ञपुरुष को मानसिक यज्ञ में लेते।
                                      उससे देव , साध्य ऋषि ये संकल्पयज्ञ ये कर लेते।
८.तस्याद्यज्ञात्सर्वहुत  संभृतं पृषादाज्यम्।
   पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यात् ग्राम्याश्चये।
                                      सर्वशुद्ध उस यज्ञपुरुष से हवियुत पदार्थ सब उपजे।
                                      पृथ्वी वनपशु तथा ग्रामपशु , ईश अंश से ये उपजे।
९.तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानिजज्ञिरे।
  छंदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्यादजायत।
                                      सर्वपवित्र सुयज्ञपुरुष से , ऋग् सामश्रुति के मंत्र।
                                      अथर्व एवं यजुर्वेद के हुए उसीसे है मंत्र
१०.तस्मादश्वा अजायन्त  ये के चोभयादतः।
     गात्रोह  जज्ञिरे तस्यात तस्याज्जाता अजायत्।
                                      उससे अश्व हुए, दोनों ही तरफ दंतवाले उससे।
                                      उससे उपजी गौ-बकरी और भेद उपजा उसीसे ।
११.यत्पुरुषं स्यदधुः कतिधा व्यकल्पयत्।
     मुखं किमस्य कौ बाहु का उरु पादा उच्येते।
                                                जब पुरुष की विशेष धारणा की थी रचना कितनी तब।
                                                उसका मुख क्या? व बाहु क्या है ? जाँघ पाँव कहलाते अब
१२.   ब्राह्मणों अस्य मुखमासीद् बाहुराजन्य कृतः।
         उरु तदस्य वैश्यः पदुभ्यां शुद्धो अजायत्।
                                      ब्राह्मण इसका मुख है , क्षत्रिय बाहुहि इससे कीन्हे है।
                                       वैश्य बने जंघा इसकी औ शुद्राचरण से उपजे है।
१३.चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सुर्यो अजायत्।
     मुखादिन्द्रधाग्निश्च  प्राणाद्वायुरजायत्।
                                      मन से चन्द्र बना, आँखों से सुर्यदेव उत्पन्न हुआ ।
                                      मुख से इन्द्र व अग्नि, प्राण से पवनदेव उत्पन्न हुआ।
१४.नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीषर्णो द्यौः समवर्तत।
     पदभ्यां भूमिर्दिक् श्रोत्रात्तया लोकां अकल्पयन्।
                                      हुआ नाभि से अन्तरिक्ष , सिर से द्युलोक उत्पन्न हुआ।
                                      पद से पृथ्वी कानों से दिक,तथा लोक कल्पना हुआ।
१५.सप्तास्यासन्परिधयण्चि स समिधः कृता।
     देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवध्यन्पुरुषं पशुम्।
                                      यज्ञप्रचारक देवों ने जब द्रष्टा ईश्वर को बाँधा।
                                      उसकी सप्त परिधियाँ थी, इक्कीस बनाई थी समिधा।
१६.पण्चेन पण्चमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
     तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः  सन्ति देवाः।
                                      यज्ञ  से हि देवों ने यज्ञ किया था, वे विधि प्रथम हुए।
                                      जहाँ पूर्व के साध्य देव है , वहा सह सुरपुर प्राप्त हुए।
१७.ऊँ यद्भवः सभृतः पृथिव्यैरसाश्च विश्व कर्मणः समवर्तताग्रे।
      तस्य त्वष्टा विदवद्रुपमैति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे।
                                      प्रथम यज्ञों से सार इकट्ठा हुआ , मिला प्रभु नियमों से।
                                      कारीगर ने रुप बनाये, सार्वदेव हो नियमों से।
१८.वेदाड़्वेदं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णः तमसः परस्तान्।
     तमेव विदित्यातिमृत्युमेति नान्या पत्या विद्यते अयनाय।
                                      जानु उससे परे महत्तम देव सूर्यसम ईश कहो।
                                      उसे जानकर मिले अमरता, अन्य मार्ग तो है ही नही।
१९.प्रजापतिश्चादि गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते।
      तस्य येति परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्युर्भुवनानि।
                                      ईश धर्म के अन्दर आता, अज होकर बहु जन्म धरे।
                                      ज्ञानी जन्म –शक्ति को जाने, उससे सभी भुवन ठहरे।
२०.यो देवेभ्यो जातनानि यो देवानां पुरोहितः ।
      पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो उच्चाय ब्राह्मणे ।
                                      जो देवों के लिए प्रकाशित , त्रेता पहले जन्मा है।
                                      तेजस्वी उस विश्वात्मा के लिए प्रणाम हमारा है।
रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा ब्रह्मे तदब्रुवन्।
यस्त्वैवं ब्राह्मणों विद्यात्तस्य देवा असन्वशे।
                                      ब्रह्मतेज को देनेवाले उत्पादक जो बोले देव।
                                      ज्ञानी प्रभु को वो जानेगा, उसके वश में होगे देव।
२२.शीश्व ते लक्ष्मीश्व पत्न्यावहोरात्रे पाश्वे।
      नक्षत्राणि रुपभिनौ व्यात्तम्।
      इस्नान्नि षाणामुं म इषाण सर्वस्योक्तं म इषाण।
                                      श्री श्रीं लक्ष्मीं ईश-पत्नियाँ ,दिन रजनी है दोनों ओर।
                                      तारागण प्रभु का प्रकाश औ द्यु –भूमि मुख प्रभु चारों ओर।
                                      इसी रुप में निज को देखो , भाषण स्तुति करने वाले।
                                      सर्वलोक की इच्छा होती , विश्वरुप धरनेवाले।
इस प्रकार चारों वेदों से एक-एक सुक्त को संक्षेप में पढ़कर हमने यह जाना कि वेदों में क्या है।वेदों से हमें जीवन की सार्थकता का अनुभव होता है।जीवन के गुढ़ रहस्यों का ज्ञान होता है ।वेद हमारी संस्कृति की धरोहर है।