Monday, 8 July 2013

स्नेह एक अहसास


स्नेह एक अहसास
‘ओस की अभागी बुंद पुष्प के ह्रदय में स्नेहासिक्त हो सिंहरती चूँ पड़ी,बुँद  ने आल्हाद के उन क्षणों को अमर बनाने की कामना की, तभी पुष्प काँप कर झड़ पड़ा। यही है पुरुष प्रकृति की चिरन्तर वेदना  । पुरुष की छोटी सी जिन्दगी में वेदना बहुत ज्यादा है,और स्नेह के क्षण ,खुशी,प्यार, मस्ती,स्वतंत्रता  इन सबके लिए समय बहुत ही कम है ।या यूँ कहिए कि इन सबके लिए व्यक्ति को पुरी जिन्दगी में से एक चौथाई हिस्सा भी नही मिलता ,जहाँ वह स्वतन्त्र रुप से बिना किसी फिक्र और चिन्ता के प्रसन्नता से जी सके।सबको चाहे वह पुरुष हो या महिला किसी न किसी के अधीन रह कर ही अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है ।जीवन सिर्फ जीने का नाम है। इसको कैसे जीया जाय , यह आपके हाथ में नही है।पता नही आपकी प्यार भरी मस्त जिन्दगी में कब कौनसा मोड़ आ जाय, और यह मोड़ आपको कहाँ से कहाँ ले जाए ।हर व्यक्ति खुश रहना चाहता है, चाहे वह छोटा सा बच्चा हो, जवान हो, वृद्ध हो,हर आयु में, हर हाल में सभी खुश रहना चाहते है। लेकिन जिन्दगी में इतनी ढेर सारी समस्याएँ होती है, जिनसे वह चाह कर भी नही उभर सकता । इन समस्याओं से निपटने में , इनसे उबरने में उसका सारा समय व्यतीत हो जाता है, और वह चाहकर भी वह खुशी नही दे पाता, जो वह अपने व अपने परिवार को देना चाहता है। हर चीज को पाने के लिए इन्तजार करना पड़ता है, इतना लम्बा इन्तजार कि उस चीज को पाने का मोह ही खत्म हो जाए।जीवन के इस सफर में सागर की शान्त लहरों की तरह सुख और दुख में समान रुप से जीवन को जीने की कोशीश करनी चाहिए, यही नियती है।

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