संस्कृत व्याकरण का उदय
महर्षि पणिनी संस्कृत व्याकरण के प्रणेता हे , अत; महर्षि पणिनी संस्कृत के प्रथम पुरुष माने जाते है उन्होने भगवान
शंकर के डमरु बजाने पर उनसे उत्पन्न शब्दों को सुनकर माहेश्वर सूत्र की रचना की ।इस आधार पर सूत्रो का निर्माण कर सम्पूर्ण संस्कृत व्याकरण का निर्माण किया ।
संस्क्रत व्याकरण वेद का प्रमुख अंग ओउर विद्वानों का मुख कहा गया है ।गुरु परम्परा से प्रसिद्ध हे कि पाणिनी ने व्याकरण शास्त्र की र चना के पहले तीर्थराज प्रयाग मे शंकर भगवान की कढिन आराधना की थी , वंहा विद्या गुरु सनक आदि ओउर भी अनेक ऋषि तपस्या रत थे ।कुछ काल बाद आशुतोष भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में ताण्डव नृत्य के अनन्तर चोदह बार डमरु बजाकर अन्तर्हित हो गये । तपस्वी लोग अपनी अपनी भवना के अनुसार उस डमरु ध्वनि से प्रेरणा लेकर अपने अपने आश्रम मे चले गये । पाणिनी के मानस पटल पर भी डमरु ध्वनि की अनुकृति पर ये चोदह वर्णात्मक सूत्र उद्भूत हो गये । ऋषि इन्ही चोदह सूत्रो को व्यकरण शास्त्र क बीजमन्त्र मानकर शस्त्र र चना में प्रवृत्त हुए ।
महर्षि पाणिनी द्वरा र चित इन सूत्रो की र चना अति महत्वपूर्ण हे । इस प्रकार महर्षि पाणिनी द्वारा संस्क्रत व्याकण का उदय हुआ ओर संस्कृत से अन्य सभी भाषाओ क निर्माण हुवा