Saturday, 2 February 2019

नया वर्ष


सूर्यास्त के साथ एक वर्ष का अस्त हो जाना , अपनी बहुत सारी यादों को समेट कर वर्ष का बीत जाना । पुरे वर्ष में बहुत सारी खट्टी मीठी यादें , जिन्हें हम याद भी करते है, और भुल भी जाते है , सब कुछ मिलाकर पुरा साल पलक झपकते व्यतीत हो जाता है  ।
‘’साल नाम का एक परिंदा मेरे जीवन में आया और चुपके से मेरी उम्र चुराकर उड़ गया ।‘’
      यूँ तो सुबह होना नित्य है , लेकिन सूर्योदय के साथ नववर्ष का आगमन ,आहा एक नई उमंग  नया उल्लास नई उर्जा सब कुछ नया नया । प्रकृति भी मानो हमारे साथ नयेपन का अहसास लिये हमारे उत्सव में शामिल होती है । सूर्योदय के आगमन के साथ जब सुबह सिंदुरी साड़ी पहन कर अपने पाँवों में किरणों की पायल बाँध लेती है, और उसकी पदचाप क्षितिज के धरातल पर गुँजती है , तो हरे पत्तों पर थिरकते औंस के बिन्दु , कलरव करते पक्षी और हौले हौले बहती बयार ऐसे सुबह का संकेत देती है , जिसकी रोशनी में मन मयुर नृत्य करने लगता है ,मन उल्लास से भर जाता है, पुरे शरीर में एक नई उर्जा का संचार होता है, तब लगता है  काश…………..पंछी बनूँ उड़ के फिरु मस्त गगन में …………..
नये वर्ष की सुबह को एक सपने की तरह ऊषा अपनी ऊजास की सलाईयों से बुनती है । जबसे सृष्टि बनी तबसे ऊषा के इस कर्म ने कभी विराम नही पाया , ज्योंही तीन सौ पैसठ सुबहों को बुन लेती है , उसका एक वर्ष का सपना पुरा हो इतिहास का यथार्थ बन जाता है । एक सपना पुरा होते ही उसके हाथ की सलाईया फिर अगले सपने को बुनने में मशगुल हो जाती है , उसके हाथ कभी थकते नही और उसके मुख पर सदैव लालिमा भरी मुस्कान खेलती रहती है , उसने असंख्य उजास भरे युग हमें बुनकर दिये है ।उसकी आशा प्रेरक और प्रणम्य है ।
      ऊषा की इसी आशा को अपने मन में संजोये यह नया वर्ष उपलब्धियों से भरपुर भविष्य का अभिनन्दन करने को तत्पर है । नये वर्ष को बनाने वाली ऊषा तो हमें एक आलोकमय वर्ष सोंप देती है , फिर यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसको किस तरह आत्मसात करें । हम अपने अच्छे बुरे कर्मो के साथ समय व्यतीत कर देते है । यदि चिन्तन सकारात्मकता से पूर्ण होगा तो आचरण भी कर्ममय होगा , और इसके लिये दोहरापन , अहंकार को त्यागना होगा ।पारदर्शी बनना होगा , जैसे जैसे पारदर्शी होगे वैसे वैसे अपने आप निर्मल होगें ।कर्म से भरपूर होगें , हमारा यह प्रयास होना चाहिये कि हम उस अतीत को न दोहराए जो कही हमारे अहं और अकर्मण्यता से उपजी असफलताओं की कहानी कहता है ।
       जब से सृष्टि बनी तब से समय बना , सागर और सरोवर बने । समय तभी से सागर और सरोवर पर अपनी तहरीर लिखता है , इसलिये कोशीश करें कि हमारे आचरण इतने पारदर्शी और उजले हो , ताकि हमारी आगे आने वाली पीढ़ी इस तहरीर के उजले अक्षरों को पढ़ सके , हमें इस सत्य को जानना चाहिए कि इतिहास के सीने में हमारे हर बरस की उपलब्धियों और नाकामियों के अफसाने दर्ज है , इसलिए भविष्य का इतिहास रोशनी से भरपूर होने की गवाही नई पीढियों को दे, यह हम जरुर याद रखे ।
  ‘’अगर फुरसत मिलें पानी की तहरीरों को पढ़ लेना , हर इक दरियाँ हजारों साल का अफसाना लिखता है ।‘’