श्री भगवान ने कहा- (१) आसक्त चित्त मम आश्रय
से , हे पार्थ योग में लगा हुवा।
गुणयुक्त मुझे जानेगा तू,यह सुन संशय से रहित हुवा।
(२) इस तत्व
ज्ञान को रहस्य युक्त, मै भारत तेरे हित कहता।
जग में फिर कुछ भी जिसे जान, जानना नही बाकी रहता।
(३) हे पार्थ
सहस्त्रो पुरुषों में , कोई सिद्धी हित मन करता है।
उन मननशील सिद्धों में मुझे, कोई यथार्थ पहिचानता
है।
(४) आकाश अग्नि
भू जल वायु, मन बुद्धि अहंकार भारत।
हे आठ प्रकार विभक्त हुई, एसी यह मम प्रकृति
भारत।
(५) यह आठ प्रकार
भेद वाली, महाबाहो प्रकृति वह मेरी।
हे दुसेरी मेरी जीव रुप , प्रकृति चैतन्य जान
मेरी।
दोहा- जिस
प्रकृति से विश्व सब , धारण किया सखाय।
उस प्रकृति के भेद को, कहता हुँ समझाय।
(६) सब विश्व
की उद्भव भुमि है, दोनों प्रकृति को पहचानों।
तुम मुझको इस
जग का कर्ता, अरु नाशक प्रलयंकर मानो।
(७) हे अर्जुन
तुम मेरे सिवाय , दुसरी वस्तु जग में नही है।
सुत्र के बीच मणियों के सम, जग गुंथा हुवा मुझ
में ही है।
(८) हे अर्जुन
जल में रस मै हुँ, भानुशशी मध्य प्रकाश मै हुँ।
वेदों में प्रणव नभ में हुँ शब्द, पुरुषों में
पराक्रम भी मै हुँ।
(९) भूमि में
पवित्र गंध मै हूँ, और अग्नि भीच तेज मै हूँ।
सब भूतों का जीवन मै हूँ, अरु तपस्वियों का
तप मै हूँ ।
(१०) हूँ बीज
सनातन सब जग का, हे वीर धनंजय मान मुझे।
मति
मानों की मति तेज पुंज , तेजस्वी जन का जान मुझे।
(११) हे भारत
मै बलवानों का, बल काम ओ राग रहित मै हूँ।
संपूर्ण
प्राणियों का भी मै, धर्मानुकुल काम मै हूँ।
(१२) जो भाव
सत्व रज तम के हें, वे सब मुझ से हे बने हुवे।
मै
पार्थ नही उनमें रहता, पर वे मुझमें हें सने हुवे।
(१३) इन तीनों
गुण के भावों से , यह सब जग मोहित रहता है।
इस
कारण गोण तीनों से परे , मम अव्यय को नही लखता
(१४) मेरी अलौकिक
अति दुस्तर, जो त्रिगुणमयी माया यह है।
मुझको ही निरन्तर
जो भजते, इस माया को तरते वह है।
(१५) मायावश
ज्ञान से हीन पुरुष, अरु दुर्जन असुर वृत्ति जो है।
अरु
वृथा कुकर्मी मूढ़ पुरुष,नही भजन मेरा करते
वो है।
(१६) यह चार
प्रकार के सुकृति जन, हें अर्जुन मुझको भजते है।
आर्त
जिज्ञासु अर्थाथी, चौथे ज्ञानी जन होते है।
(१७) उसमें
भी एकीभाव में स्थिर , मम भक्त ज्ञानी जन उत्तम है।
मै
ज्ञानी को अति प्यारा हूँ, अरु मुझको ज्ञानी प्रियतम है।
(१८) वैसे उदार
यह सब ही है, मम भक्त ज्ञानी मम रुप ही है।
वह
मुझ में ही स्थिर रहता है, जो उत्तम गति स्वरुप ही है।
(१९) बहु जन्म
वाद वह जानता है, सब विश्व यह वासुदेव ही है।
यह
जान मुझे जो भजता है, वह ज्ञानी अति दुर्लभ ही है।
(२०) निज स्वभाव
से प्रेरित होकर , उन उन भोगों की इच्छा से ।
वह
ज्ञान हीन उस नेम को रख, सुर अन्य पुजते वांछा से।
(२१) जो जो
इच्छुक जिस जिस सुर को, श्रद्धा समेत पुजन करता।
उस
उस जन की उस देव प्रति, मै श्रद्धा को सुस्थिर करता।
(२२) वह उस
श्रद्धा से युक्त हुवा, उस देव का पुजन करता है।
मम
विहित काम्य भोगों को नर, उस देव से प्राप्ति करता है
(२३) उन अल्प
बुद्धि वालों का वह, फल नाशवान ही होता है।
देवों
के पुजक देवों को, मम भक्त प्राप्त मोहि होता है।
(२४) अति उत्तम
अव्यय परम भाव, मति हीन मेरे नही मानते है।
इन्द्रिय अतीत मुझ ईश्वर को, नर जन्म की भांति
मानते है।
(२५) मै निज
माया से छुपा हुवा, सर्व को प्रत्यक्ष नही होता।
मुझ जन्म रहित अविनाशी को, नही जान मुर्ख
खाता गोता।
दोहा-
वर्तमान अरु भुत में, अरु जो आगे होय।
मै
तो सबको जानता, मुझे न जाने कोय।
(२६) हे भारत
इस संसार बीच, इच्छा व द्वेष से प्रगट हुवे।
सुख
दुख आदि ममता द्वारा, सब प्राणि मोह को प्राप्त हुवे।
(२७) हो गया
जिन्हों का पाप नष्ट, वह श्रेष्ठ कर्म नर करते है।
वह
मोह द्वन्द से मुक्त हुवे, दृढ़ निश्चय मुझको भजते है।
(२८) जो जरा
मरण से बचने का, मम आश्रित होय यत्न करते।
वे
ब्रह्म तथा अध्यात्म सर्व, अरु कर्मणि सब जाना करते।
(२९) अधिभुत
और अधिदेव सहित , अधियज्ञ सहित मोहि जानते हे वे अन्य समय भी युक्त
चित्त, योगी जन मुझे मानते है।इति।
भजन
प्रभु धरो शीघ्र अवतार,
कृष्ण बंशी के बजाने वाले।
यह भारत दीन दुखारी,
नित जोवट बाट तिहारी।
दो दर्शन कृष्ण मुरारीजी,
नंदलाल कहाने वाले। प्रभु……
बिलखत हे धेनु बिचारी,
बिन मोत जाय नित मारी।
असेरो से बचा गिरधारीजी,
गोपाल कहाने वाले।प्रभु…….
जो वेगी नही पधारो, निशिचर
सब धेनु संहारे।
फिर पछताओगे प्यारेजी,
कर चक्र धारने वाले।प्रभु…….
कवि जगन विकल हे भारी,
गौवन की दशा निहारी।
कर रक्षा वीर बिहारीजी,
गजराज उबारन वाले।प्रभु……इति श्री सप्तम