Wednesday, 27 November 2013

पक्षियों का संसार

पक्षियों का संसार बड़ा अनोखा एवं निराला है।उनकी दुनियाँ बड़ी अदभूत है। रंग-बिरंगी तितलियाँ , चिड़ियाँ ,गिलहरी, रंग-बिरंगे सुन्दर-सुन्दर पक्षी इनको देखकर मन में एक अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। घर के बाहर एक निम्बु का तथा एक जाम का पेड़ है। जाम पर तोते तथा अन्य बहुत सारे पक्षी आकर बैठते है, निम्बु के पेड़ पर बहुत सारी चिड़ियाँ रहती है, सुबह ६बजे उनको बाजरा डालती हूँ, तुरन्त सारी चिड़ियाँ नीचे आकर चुगने लगती है, उनको देखकर उनकी आवाज सुनकर एक अदभूत आनन्द की अनुभुति होती है। ५मिनट देर हो जाने पर उनकी चहचहाहट बहुत तेज हो जाती है, लगता है, आपको आवाज लगाकर बुला रही है।समीप ही उनके लिए पानी का पात्र रखा है, जिसमें वह डुबकी लगा-लगाकर नहाती है।मै भी अपनी चाय लेकर बाहर ही बैठकर उनको देखती रहती हूँ,कुछ एक-दुसरे को चोंच में चोंच डालकर खिलाती है।सब कुछ देखकर बड़ा मजा आता है। पक्षियों के बारे में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित है-कोयल की कुक को सुनकर मजेदार बातें कही जाती है।वह यह कि इसके कुकने का मतलब यह है कि कोई इनसे अपने भविष्य के बारे में सवाल कर रहा है, और वह जवाब दे रही है। युवा पुछते है कि मेरी शादी कब होगी?, विवाहित जोड़े पुछते है-हमारे यहाँ नया मेहमान कब आएगा? बुजुर्ग पुछते कि अभी और कितनी जिन्दगी बाकी है। इतने सारे सवालों का जवाब देने में व्यस्त होने के कारण बिचारी कोयल को अपना घोंसला बनाने की फुर्सत ही नही मिल पाती, और वह कौए के घोंसले मे ही अंडे दे आती है।
          रंग-बिरंगे पक्षियों को देखकर मन अपने आप आकर्षित होता है। उनमें कोई जादुई या दैवीय बात नजर आना असामान्य नही है,यही कारण है कि भारत ही नही , अपितु विदेशों में भी पौराणिक तथा लोक कथाओं में विभिन्न प्रकार के पक्षियों का जिक्र बार-बार आता है। रात में विचरने वाला पक्षी होने के कारण  उल्लु को लेकर तरह-तरह की धारणाएँ चली आई है।युनान में इसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।यदि युद्ध पर जाते समय इसके दर्शन हो जाय ,तो समझो जीत पक्की है। इसके विपरीत रोम में उल्लु दिखना अपशगुन माना जाता है, भारत में इसे दैवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। तो कैमरुन में इसे कोई नाम ही नही दिया गया, वहाँ इसे डरावना पक्षी ही कहा जाता है। अफ्रीका में कहते है एक काला जादु करने वाला रात में उल्लु बनकर शरारत करता है।
                           
  रंग-बिरंगी तितलियों को देखकर भी बड़ा आनन्द आता है। ईश्वर ने उनको इतने सारे और इतने प्यारे-प्यारे रंग कैसे दिय होगे, आदिवासी मान्यता है कि कई सदियों पहले पक्षी रंग-्बिरंगे नही हुआ करते थे।सारे पक्षियों का एक ही रंग था, और वह था काला। एक दिन शांति से जीने वाले कपोत का पैर एक पेड़ की टुटी हुई शाखा की नोंक से जा टकराया, और बुरी तरह घायल हो गया। उसने दर्द से तड़पते हुए अपने साथी पक्षियों को आवाज दी। सभी पक्षी उसकी मदद को आ गए। कोई अपने पँखो से उसे हवा करने लगा, कोई उसके लिए पानी ले आया, कोई उसके घायल पैर को
सहलाने लगा। मगर बदमिजाज कौआ दूर ही रहा, वह बोला- छोड़ो भी, यह तो यु ही मर भी जायगा, क्यों इस पर अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो। इस पर नाराज पक्षियों ने कौए को भगा दिया। इधर कपोत का शरीर सफेद पड़ गया, वह अंतिम साँसे गिनने लगा। तभी तौते को एक विचार आया, उसने अपनी नुकीली चौंच से कपोत के घायल पैर को जोर से काट लिया, कपोत दर्द से चीख उठा । लेकिन तभी उसके घाव से बीसीयों रंग फूट पड़े, और आसपास खड़े पक्षियों पर जा गिरे, किसी के शरीर पर एकाध रंग ही लगा, किसी के शरीर पर चार-पाँच, इस प्रकार विभिन्न पक्षियों को ये रंग प्राप्त हुए। हाँ बदमिजाज कौआ इन रंगों में नहाने से रह गया, और वह काला का काला ही रहा ।इधर कपोत जल्द ही स्वस्थ हो गया, और अपना नया सफेद रंग लिए उड़ने लगा।
                             आकाश में उड़ने का वरदान प्राप्त इन पक्षियों को देखकर लगता है, काश हमारे पास भी पंख होते और हम भी इन की तरह स्वच्छंन्द रुप से आकाश में विचरण करते।

                             पंख होते तो उड़ जाती रे’………………………..                    
                                               

Wednesday, 6 November 2013

महाकवि कालिदास


संस्कृत साहित्य के इतिहास में महाकवि कालिदास का नाम सर्वोपरि है। श्री कालिदासजी ने हर क्षैत्र में हास्य करुणा श्रृंगार प्रकृति चित्रण आदि सभी विषयों का बहुत सुन्दर और अलौकिक चित्रण किया है, किन्तु इन सबसे हटकर कालिदास के साहित्य में भारतीय जनता की राष्ट्र निर्माण शक्ति का स्पष्ट परिचय मिलता है।
कवि तो बहुत होते है, पर एसे कवि कम ही होते है, जिन्हें राष्ट्र की समग्र सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्ति देने की कला का अधिकार होता है।कालिदास एसी ही राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना को मुर्ति देने वाले महान कवि है।भारतवर्ष के ऋषियों ,सच्चे कलाकारों ,राजपुरुषों, और विचारको ने जो कुछ उत्तम और महान किया है,उसके सहस्त्रो वर्षो के इतिहास का जो कुछ सौंदर्य है ,उसने मनुष्य को पशु तुल्य धरातल से उठाकर देवत्व में प्रतिष्ठित करने की जितनी विधियों का संधान किया है, उन सबको ललित, मोहक और सशक्त भावी देने का काम कालिदास ने किया है।
                                      भारतवर्ष बहुत विशाल देश है। स्थान मे भी और काल मे भी। यह विशाल भुखण्ड भौगोलिक दृष्टि से सब प्रकार से एक अविभाज्य ईकाइ है। उत्तर में पर्वतराज हिमालय दोनों भुजाओं से पूर्व और पश्चिम समुद्र को छुता हुआ इस प्रकार छाया हुवा है, मानो पृथ्वी का मापदंड हो। कालिदास ने कहा है- अस्यु देवतान्या नगाधिराज हिमालय द्वारा विभाजित समुद्र मेलय भारतभुमि ही वह राष्ट्र है ,जो कालिदास की वाणी में अपने सम्पूर्ण आध्यात्मिक और आधिभौतिक वैभव के साथ प्रकट हुवा है।
          कालिदास के आविर्भाव काल तक बाहर से अनेक मानव मँडलिया इस देश में आ चुकी थी,कुछ आक्रामक रुप में आई, कुछ इस देश की उर्वरा भूमि में बस जाने की कामना से। उनके विभिन्न प्रकार के आचार विचार वाद्य गीत उत्सव आयोजन आदि ने इस महान देश की जलमंडली के वैचित्र्य में वृद्धि की ।मानव मंडलियाँ इस देश का अंश बन गई। यहाँ के मनीषियों के आध्यात्मिक विचारों से वे प्रभावित हुई।साथ ही इस देश के रहन-्सहन को प्रभावित करने में भी समर्थ हुई। यह देश मानों विधाता की ओर से ही समस्त धर्म और संस्कृतियों का संगमस्थल बनाया गया था। नाना आचार विचारों विश्वासों की मिलन भुमि होने के कारण इस देश की संस्कृति में अनेक प्रकार के वैचित्र्य है, काव्य में,चित्र में, मूर्ति में, वस्तु में,नृत्य गीत वाद्य में और नाटक आदि प्रमुख कलाओं में नवीन बातों का समावेश होता गया।और एक प्रकार की प्रच्छन्न गतिशीलता का प्रादुर्भाव हुआ ।इस बहु विचित्र जलमंडली के सर्वोत्तम को रुप ललित रुप देना ही मर्मभेदिनी दृष्टि और अर्थसाहित्य शक्ति का परिचायक है।कालिदास इस महान शक्ति से ओतप्रोत थे।इसीलिए वे सम्पूर्ण राष्ट्रीय चेतना को ललित रुप देने में कृतकार्य हुए।